Friday, September 7, 2018


साक्षर को शिक्षित करने की चुनौती
सामान्य अर्थ में साक्षर वह कहलाता है जो सहज तरीके से पढ़ने, लिखने एवं सरल गणितीय समस्याओं को हल करने की क्षमता हासिल कर ले। एक साक्षर व्यक्ति से यह उम्मीद की जाती है कि वह हस्ताक्षर करने से पहले किसी दस्तावेज को पढ़ सके, सड़क के संकेतों को समझ सके, तथा रोजमर्रा के हिसाब-किताब को रख सके ताकि सहज ढंग से दैनिक गतिविधियों को संचालित किया जा सके। आंकडों के संदर्भ में देंखे तो भारत में साक्षरता के आंकड़े सालोसाल बढ़ रहे हैं। 2011 की जनगणना के अनुसार 74.04 प्रतिशत साक्षरता थी जबकि इस समय 2018 में साक्षरता लगभग 80 प्रतिशत है, जो कि विश्व की औसत साक्षरता दर 84 प्रतिशत से कम है। अगर हम अनेक किंतु-परंतुओं को परे रखकर आंकड़ों में मूल्यांकन करें तो ठीक-ठाक प्रगति मानी जा सकती है।
शिक्षा एक व्यापक अवधारणा है। शिक्षित होने के लिए साक्षरता सहायक तो हो सकती है, अनिवार्य नहीं। भारतीय संदर्भ में अनेक संत-महात्मा, लोककवि, अनेक शासक एवं सामान्य जन, प्रकांड विद्वान एवं ज्ञानी हुए, इस ज्ञान परंपरा में निरक्षरता कभी बाधा नहीं बनी। शिक्षा सिर्फ डिग्री प्राप्त करने और परीक्षा पास करने की मोहताज नहीं है। शिक्षा लोगों को ज्ञान के माध्यम से एक संपूर्ण मानव बनाती है। यह दिमाग के नित नए दरवाजे-खिड़कियां खोलकर चीजों को नए तरीके से समझने में मदद करती है। यह इंसान को अनेक पूर्वग्रहों, अंधविश्वासों आदि से छुटकारा पाने तथा तार्किक, जनतांत्रिक बनाकर समभाव एवं सहयोग के माध्यम से मानव मूल्यों के लिए संघर्ष करने में सक्षम बनाती है।
हिन्द स्वराजमें गांधीजी ने लिखा है कि ‘‘तालीम (शिक्षा) का अर्थ अगर सिर्फ अक्षर ज्ञान ही हो, तो वह तो एक साधन जैसा ही हुआ। उसका अच्छा उपयोग भी हो सकता है और बुरा भी। एक शस्त्र से चीर-फाड़ करके बीमार को अच्छा किया जा सकता है और वही शस्त्र किसी की जान लेने के काम में लाया जा सकता है।’’ गांधी की शिक्षा की मंशा बच्चों को सुधार-सँवार कर आदर्श नागरिक बनाना है। उनका मानना था कि बुनियादी शिक्षा हिंदुस्तान के तमाम बच्चों को हिंदुस्तान की सभ्यता और संस्कृति के अनुरूप बनाती है। यह तालीम बालक के मन और शरीर दोनों का विकास करती है। संक्षेप में गांधीजी के शिक्षा का उद्देश्य जीविकोपार्जन, चारित्रिक विकास, सांस्कृतिक विकास, व्यक्ति और समाज का विकास, सामाजिक पुनर्निर्माण, सदाचार और नैतिकता, राष्ट्रीय एकता, आत्मानुभूति, ईश्वर प्राप्ति तथा व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास है।
आधुनिक जीवन में साक्षरता की भूमिका बहुत बढ़ गई है। आज जीवन के किसी भी क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए साक्षरता ही तो प्राथमिक सीढ़ी है। भारत के बच्चों को दो तरह से साक्षर किया जा रहा है एक तो वह जिसे सरकारी स्कूल कहा जाता है, जिसमें दोपहर के भोजन के लालच में बच्चे स्कूल जा रहे हैं और जैसे-तैसे साक्षर होकर देश की साक्षरता के आंकड़े दुरुस्त करने में सरकार का सहयोग कर रहे हैं और अकुशल बेरोजगारों की फौज में शामिल हो रहे हैं। दूसरे विशेष साक्षरता वाले अंग्रेजी माध्यम के वे पब्लिक स्कूल हैं, जो मोटी फीस लेकर कामयाब होने वाले विशेषज्ञ साक्षर पैदा कर रहे हैं। इस वर्ग में शिशु के पैदा होने के दो साल के अंदर ही प्ले स्कूलों के माध्यम से ही साक्षरता प्रारंभ हो जाती है जो तब कहीं जाकर रुकती है जब वह कोई प्रशासनिक अधिकारी, डॉक्टर, इंजीनियर, प्रबंधक, पत्रकार प्रोफेसर, वकील आदि बनकर अपने-अपने क्षेत्रों में सफलता का परचम फहराता है। इसके लिए हर बच्चे के माँ-बाप सबकुछ करने को तैयार हैं, जिसमें कोई समझौता, कोई कीमत मायने नहीं रखती, बस उसे किसी तरह सफलता मिल जाए!
इतने समझौते और संघर्ष के बाद जब वह बच्चा सार्वजनिक जीवन में प्रवेश करता है तो उन्हें वास्तविक अर्थ में शिक्षित माना जा सकता है? अगर ऐसा हो गया होता तो क्या आज भी पद के अनुरूप दहेज की कीमत तय होती? हर विभाग के अंदर भ्रष्टाचार से सामान्य लोगों का जीना दूभर रहता? डॉक्टरों के रहते गरीब मरीज लाइलाज मरते? इसी का एक तबका आतंकवाद और नक्सलवाद में शामिल होता? इसी तरह इंजीनियर, सी.ए, शिक्षक, प्रोफेसर आदि अनेक क्षेत्रों के कितने लोग दावे के साथ कह सकते हैं कि वे राष्ट्रनिर्माण व व्यापक सामाजिक हित के लिए कर्तव्यों का ईमानदारी पूर्वक निर्वहन कर रहे हैं? अगर अपनी सफलता का दोहन सिर्फ निजी स्वार्थ पूर्ति के लिए ही करना है तो फिर ये किस मायने में शिक्षित हुए? इन्हें ज्यादा से ज्यादा सिर्फ विशेष डिग्रीधारी साक्षर माना जा सकता है, जो अपनी विशेष साक्षरता का उपयोग एवं दुरुपयोग सिर्फ अपने निजी भौतिक स्वार्थ के लिए करते हैं।
आज के दौर में देश और समाज को अनपढ़ों से ज्यादा खतरा दोनों तरह से तैयार किए जा रहे साक्षर कुपढ़ों से है। हर दिन गाँव, कस्बों एवं शहरों में हिंसा, बलात्कार एवं सार्वजनिक संपत्तियों का विनाश का एक नया वीभत्स रूप सामने आ रहा है। जिसे सोशल मीडिया के माध्यम से त्वरित गति से फैलाया जा रहा है। वह इन्हीं साक्षर कुपढ़ों की कारस्तानी है। दूसरी तरफ डिग्रीधारी विशेष बौद्धिक साक्षर वर्ग, जिसमें साहित्यकार, लेखकों एवं पत्रकारों का भी एक तबका नित घटने वाली अनेक तरह की हिंसा, उपद्रव और बलात्कार जैसी शर्मनाक घटनाओं के तथ्यों एवं आंकड़ों को तोड़-मोड़कर पद और प्रतिष्ठानों में जगह पाने के लिए दलीय राजनीति में फंसकर बड़ी बेशर्मी से वैमनस्य फैलाने में सूत्रधार की भूमिका निभा रहे हैं। 
यह नहीं कहा जा सकता है कि इन दोनों माध्यमों से निकले साक्षरों में शिक्षित कोई है ही नहीं, अगर नहीं होता तो पूरी व्यवस्था ध्वस्त हो जाती। इन्हीं माध्यमों से निकला एक समूह अपने परिवार, समाज और अच्छे शिक्षकों एवं स्वयं के प्रयास से शिक्षित होकर राष्ट्रनिर्माण और समाजसेवा में जी-जान से लगा है। परंतु कुपढ़ साक्षर आज हर जगह हावी होते जा रहे हैं। आज निरक्षरों को साक्षर करने से भी बड़ी चुनौती इन साक्षरों को सही मायने में शिक्षित करने की है। इन्हें मानवता और भारतीय जीवन मूल्यों के अनुरूप शिक्षित नहीं किया गया तो आनेवाले समय में परिवार, समाज, राजनीति, पर्यावरण जैसे अनेक क्षेत्रों में अनेक तरह की हिंसा, विघटन एवं विध्वंस अभी से कई गुणा बढ़ने वाले हैं। 



निर्मल हृदय की निर्ममता
रांची स्थित निर्मल हृदयमें मासुम बच्चों को बेचने की खबरों से सालों पहले घटी एक दुखद घटना बरबस याद आ गई। मैं इंटर पास करके दिल्ली आगे की पढ़ाई करने आया था। मेरे बड़े भाई मदनगीर के पास दक्षिणपुरी में झुग्गी बासिंदो के लिए 20 गज की जमीन पर बने कमरे में किराये पर रहते थे। दिन में वे ऑफिस चले जाते थे और मैं ज्यादातर कमरे पर ही रहता था। बगल में ही रहने वाला एक लड़का दीपक जो मुझसे कुछ छोटा यानी 15-16 साल का, सुंदर, लंबा और छरहरा किशोर था। हमेशा मेरी सहायता करने के लिए तत्पर रहता, अक्सर शाम को पास के किसी पार्क मंदिर या मार्केट घुमाने ले चलता। एक दिन दोपहर में कुछ पढ़ते हुए आंखे लग गई थीं। नीचे गली में एकाएक बड़ा शोर सुनाई पड़ा देखा तो लोमहर्षक दृश्य देखकर आवाक् रह गया। पता चला कि दीपक विराट सिनेमा के पास मैदान में दोस्तों के साथ खेल रहा था, किसी बात पर लड़ाई हुई और किसी लड़के ने उसके सीने में बड़ा सा चाकू जोरों से घुसेड़ दिया। वह लहू से लथपथ तीव्र गति से माँ...माँऽऽऽ...चिल्लाते हुए करीब एक किलोमिटर की दूरी चंद मिनटों में ही तय करके अपनी गली में खाट पर बैठी अपनी माँ की छाती में समाता चला गया और कुछ ही पलों में दम तोड़ दिया। उसकी आखें जड़ हो गईं, मां पत्थर बन गई! पूरी गली स्तब्ध जहाँ का तहाँ जम गयी थी।
बीमार, असहाय, गरीबों को सहारा देनेवाली, संवेदना और ममता की प्रतिमूर्ति मानी जानेवाली मदर टेरेसा, जिन्हें भारत रत्न, नोबेल पुरस्कार, तथा मृत्यु के बाद संत का दर्जा दिया गया। उनकी संस्था मिशनरीज ऑफ चौरिटीकी ओर से संचालित संस्था निर्मल हृदयपर बड़ी मात्रा में बच्चे को बेचने एवं मानव तस्करी में संलग्न पाया गया है। झारखंड की राजधानी रांची स्थित निर्मल हृदयकी संचालिका सिस्टर कोंसिलिया बाखला, सिस्टर मेरिडियन और कर्मचारी अनिमा को 4 जुलाई को गिरफ्तार कर लिया गया है। पुलिस को दिए बयान के मुताबिक सिस्टर कोंसिलिया ने स्वीकारा है कि उसने अब तक छह बच्चों को अवैध तरीके से बेचा है। यह मामला तब खुला जब यूपी के सोनभद्र जिले के ओबरा निवासी सौरभ अग्रवाल बाल कल्याण समिति के पास शिकायत लेकर पहुंचे कि उन्हें उनका बच्चा वापस नहीं दिया जा रहा है। इस बच्चे को उन्होंने पाँच मई को 1.20 लाख रु. में खरीदा था।
एफआईआर में दर्ज जानकारी के मुताबिक गुमला की एक रेप पीड़िता अविवाहित लड़की ने बीते एक मई को रांची सदर अस्पताल में बच्चा को जन्म दिया। इस नवजात को कर्मचारी अनिमा इंदवार तथा सिस्टर कोंसिलिया ने अग्रवाल दंपती को बेच दिया। इधर 30 जून को सीडबल्यूसी के सदस्यों ने संस्था का दौरा किया था। इससे डरकर अनिमा ने उसी दिन अग्रवाल दंपति को फोन कर कहा कि बच्चे को अदालत में पेश करना है, उसे लेकर रांची आ जाइए। उन्होंने बच्चे को दो जुलाई अनिमा को दे दिया। तीन जुलाई को बच्चे की जानकारी लेने वह संस्था पहुंचे, जहाँ उन्हें बच्चे से नहीं मिलने दिया गया। इसके बाद उसी दिन उन्होंने इसकी शिकायत सीडबल्यूसी से की। सूचना मिलते ही चेयरमैन रूपा कुमारी निर्मल हृदयपहुंची।
बाल कल्याण समिति, जिला समाज कल्याण अधिकारी, पुलिस तथा अन्य अधिकारियों की प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि निर्मल हृदय में रहीं पीड़िताओं जिनमें बिन ब्याही मां, रेप की शिकार बेसहारा लड़कियां-महिलाएं जो बच्चा जनने वाली होती हैं, उन्हें निर्मल हृदयमें रखा जाता है। इन्हीं से जन्मे और शिशु भवन में रखे गए 280 बच्चों का कोई अता-पता नहीं है। अब तक की जांच के दौरान जब्त किए गए कागजात के अनुसार 2015 से 2018 तक उक्त दोनों जगहों (निर्मल हृदय, शिशु भवन) में 450 गर्भवती पीड़िताओं को भर्ती कराया गया। इनसे जन्मे 170 बच्चों को बाल कल्याण समिति के समक्ष प्रस्तुत किया गया या जानकारी दी गई। शेष 280 बच्चों का कोई अता-पता नहीं है।
इस काले धंधे से जुड़े लोगों की पहुँच इतनी है कि बच्चों की खरीद-बिक्री के खेल पर हाथ डालने वाले सीडब्ल्यूसी के तत्कालीन अध्यक्ष ओमप्रकाश सिंह और सदस्य मु.अफजल जब 2015 में डोरंडा स्थित शिशु भवन का निरीक्षण करने गए थे। इस दौरान उन्हें वहां घुसने से रोका गया, जबरन जांच के लिए घुसे तो छेड़छाड़ का आरोप लगाकर साजिश के तहत बर्खास्त करा दिया गया। इसके बाद लंबे समय तक अध्यक्ष का पद खाली रहने के बाद अपने अनुकूल जहांआरा को प्रभारी अध्यक्ष बनवाया गया ताकि वे मिलजुलकर इस कुकृत्य को चलाते रहें।
मदर टेरेसा पर उनके जीते जी और मरने के बाद भी देश-विदेश के अनेक लोगों ने समाजसेवा के नाम पर धर्म परिवर्तन करवाने तथा तथा दुनिया भर से चंदे के रूप में मिलने वाले अरबों रुपयों का गलत इस्तेमाल का आरोप लगता रहा है। जिसपर अधिकांश लोगों ने ध्यान नहीं दिया तथा उन्हें असहायों की माँ मानते रहे और उनकी संस्थाओं को सम्मान देते रहे। परंतु अब जब निर्मल हृदय की अनेक शाखाओं द्वारा बच्चों को बेचने और मानव तस्करी के नित नए प्रमाण मिल रहे हैं तो यह बड़ा विश्वासघात है।
बीसेक साल पहले दिल्ली के दक्षिणपुरी के दीपक को किसी ने चाकू मारा वह जनून में आखिरी दम तक मौत से संघर्ष करते हुए माँ के आंचल में समा जाना चाहता था उसे यह एहसास था कि यहाँ सारे कष्टों से मुक्ति मिल जाएगी। असहाय, अत्यंत दुखी और बलात्कार की शिकार अनेक लड़कियां और औरतें भी इसी आशा से निर्मल हृदय की शरण लेती हैं कि वहां उन्हें एक नया जीवन मिलेगा, परंतु निर्मल हृदयमें तो उनके मजबूरियों को ही व्यापार में बदलकर मानव तस्करी की जा रही है। यह तो ठीक यही बात हुई कि दीपक मरणांतक पीड़ा से चीत्कार करते हुए आ रहा हो, उधर उसकी माँ मानव अंग के तस्करों से पहले से ही सौदा कर तैयार रखा हो कि जैसे ही दीपक आए मरने से पहले ही उसके सारे अंगों को निकाल-निकालकर बेच दे। निर्मल हृदयकी निर्मम हृदयहीनता मानव समाज एवं सभ्यता की बहुत बड़ी त्रासदी है!