साक्षर को शिक्षित करने की चुनौती
सामान्य अर्थ में साक्षर वह कहलाता है जो सहज
तरीके से पढ़ने, लिखने
एवं सरल गणितीय समस्याओं को हल करने की क्षमता हासिल कर ले। एक साक्षर व्यक्ति से
यह उम्मीद की जाती है कि वह हस्ताक्षर करने से पहले किसी दस्तावेज को पढ़ सके,
सड़क के संकेतों को समझ सके, तथा रोजमर्रा के
हिसाब-किताब को रख सके ताकि सहज ढंग से दैनिक गतिविधियों को संचालित किया जा सके।
आंकडों के संदर्भ में देंखे तो भारत में साक्षरता के आंकड़े सालोसाल बढ़ रहे हैं। 2011 की जनगणना के अनुसार 74.04 प्रतिशत साक्षरता थी
जबकि इस समय 2018 में साक्षरता लगभग 80
प्रतिशत है, जो कि विश्व की औसत साक्षरता दर 84 प्रतिशत से कम है। अगर हम अनेक किंतु-परंतुओं को परे रखकर आंकड़ों में
मूल्यांकन करें तो ठीक-ठाक प्रगति मानी जा सकती है।
शिक्षा एक व्यापक अवधारणा है। शिक्षित होने के
लिए साक्षरता सहायक तो हो सकती है, अनिवार्य नहीं। भारतीय संदर्भ में अनेक
संत-महात्मा, लोककवि, अनेक शासक एवं
सामान्य जन, प्रकांड विद्वान एवं ज्ञानी हुए, इस ज्ञान परंपरा में निरक्षरता कभी बाधा नहीं बनी। शिक्षा सिर्फ डिग्री
प्राप्त करने और परीक्षा पास करने की मोहताज नहीं है। शिक्षा लोगों को ज्ञान के
माध्यम से एक संपूर्ण मानव बनाती है। यह दिमाग के नित नए दरवाजे-खिड़कियां खोलकर
चीजों को नए तरीके से समझने में मदद करती है। यह इंसान को अनेक पूर्वग्रहों,
अंधविश्वासों आदि से छुटकारा पाने तथा तार्किक, जनतांत्रिक बनाकर समभाव एवं सहयोग के माध्यम से मानव मूल्यों के लिए
संघर्ष करने में सक्षम बनाती है।
‘हिन्द स्वराज’ में गांधीजी ने
लिखा है कि ‘‘तालीम (शिक्षा) का अर्थ अगर सिर्फ अक्षर ज्ञान
ही हो, तो वह तो एक साधन जैसा ही हुआ। उसका अच्छा उपयोग भी
हो सकता है और बुरा भी। एक शस्त्र से चीर-फाड़ करके बीमार को अच्छा किया जा सकता है
और वही शस्त्र किसी की जान लेने के काम में लाया जा सकता है।’’ गांधी की शिक्षा की मंशा बच्चों को सुधार-सँवार कर आदर्श नागरिक बनाना है।
उनका मानना था कि बुनियादी शिक्षा हिंदुस्तान के तमाम बच्चों को हिंदुस्तान की
सभ्यता और संस्कृति के अनुरूप बनाती है। यह तालीम बालक के मन और शरीर दोनों का
विकास करती है। संक्षेप में गांधीजी के शिक्षा का उद्देश्य जीविकोपार्जन, चारित्रिक विकास, सांस्कृतिक विकास, व्यक्ति और समाज का विकास, सामाजिक पुनर्निर्माण,
सदाचार और नैतिकता, राष्ट्रीय एकता, आत्मानुभूति, ईश्वर प्राप्ति तथा व्यक्तित्व का
सर्वांगीण विकास है।
आधुनिक जीवन में साक्षरता की भूमिका बहुत बढ़ गई
है। आज जीवन के किसी भी क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए साक्षरता ही तो प्राथमिक सीढ़ी
है। भारत के बच्चों को दो तरह से साक्षर किया जा रहा है एक तो वह जिसे सरकारी
स्कूल कहा जाता है, जिसमें
दोपहर के भोजन के लालच में बच्चे स्कूल जा रहे हैं और जैसे-तैसे साक्षर होकर देश
की साक्षरता के आंकड़े दुरुस्त करने में सरकार का सहयोग कर रहे हैं और अकुशल
बेरोजगारों की फौज में शामिल हो रहे हैं। दूसरे विशेष साक्षरता वाले अंग्रेजी
माध्यम के वे पब्लिक स्कूल हैं, जो मोटी फीस लेकर कामयाब
होने वाले विशेषज्ञ साक्षर पैदा कर रहे हैं। इस वर्ग में शिशु के पैदा होने के दो
साल के अंदर ही प्ले स्कूलों के माध्यम से ही साक्षरता प्रारंभ हो जाती है जो तब
कहीं जाकर रुकती है जब वह कोई प्रशासनिक अधिकारी, डॉक्टर,
इंजीनियर, प्रबंधक, पत्रकार
प्रोफेसर, वकील आदि बनकर अपने-अपने क्षेत्रों में सफलता का
परचम फहराता है। इसके लिए हर बच्चे के माँ-बाप सबकुछ करने को तैयार हैं, जिसमें कोई समझौता, कोई कीमत मायने नहीं रखती,
बस उसे किसी तरह सफलता मिल जाए!
इतने समझौते और संघर्ष के बाद जब वह बच्चा
सार्वजनिक जीवन में प्रवेश करता है तो उन्हें वास्तविक अर्थ में शिक्षित माना जा
सकता है? अगर
ऐसा हो गया होता तो क्या आज भी पद के अनुरूप दहेज की कीमत तय होती? हर विभाग के अंदर भ्रष्टाचार से सामान्य लोगों का जीना दूभर रहता? डॉक्टरों के रहते गरीब मरीज लाइलाज मरते? इसी का एक
तबका आतंकवाद और नक्सलवाद में शामिल होता? इसी तरह इंजीनियर,
सी.ए, शिक्षक, प्रोफेसर
आदि अनेक क्षेत्रों के कितने लोग दावे के साथ कह सकते हैं कि वे राष्ट्रनिर्माण व
व्यापक सामाजिक हित के लिए कर्तव्यों का ईमानदारी पूर्वक निर्वहन कर रहे हैं?
अगर अपनी सफलता का दोहन सिर्फ निजी स्वार्थ पूर्ति के लिए ही करना
है तो फिर ये किस मायने में शिक्षित हुए? इन्हें ज्यादा से
ज्यादा सिर्फ विशेष डिग्रीधारी साक्षर माना जा सकता है, जो
अपनी विशेष साक्षरता का उपयोग एवं दुरुपयोग सिर्फ अपने निजी भौतिक स्वार्थ के लिए
करते हैं।
आज के दौर में देश और समाज को अनपढ़ों से ज्यादा
खतरा दोनों तरह से तैयार किए जा रहे साक्षर कुपढ़ों से है। हर दिन गाँव, कस्बों एवं शहरों में हिंसा,
बलात्कार एवं सार्वजनिक संपत्तियों का विनाश का एक नया वीभत्स रूप
सामने आ रहा है। जिसे सोशल मीडिया के माध्यम से त्वरित गति से फैलाया जा रहा है।
वह इन्हीं साक्षर कुपढ़ों की कारस्तानी है। दूसरी तरफ डिग्रीधारी विशेष बौद्धिक
साक्षर वर्ग, जिसमें साहित्यकार, लेखकों
एवं पत्रकारों का भी एक तबका नित घटने वाली अनेक तरह की हिंसा, उपद्रव और बलात्कार जैसी शर्मनाक घटनाओं के तथ्यों एवं आंकड़ों को
तोड़-मोड़कर पद और प्रतिष्ठानों में जगह पाने के लिए दलीय राजनीति में फंसकर बड़ी
बेशर्मी से वैमनस्य फैलाने में सूत्रधार की भूमिका निभा रहे हैं।
यह नहीं कहा जा सकता है कि इन दोनों माध्यमों से
निकले साक्षरों में शिक्षित कोई है ही नहीं, अगर नहीं होता तो पूरी व्यवस्था ध्वस्त हो जाती।
इन्हीं माध्यमों से निकला एक समूह अपने परिवार, समाज और
अच्छे शिक्षकों एवं स्वयं के प्रयास से शिक्षित होकर राष्ट्रनिर्माण और समाजसेवा
में जी-जान से लगा है। परंतु कुपढ़ साक्षर आज हर जगह हावी होते जा रहे हैं। आज
निरक्षरों को साक्षर करने से भी बड़ी चुनौती इन साक्षरों को सही मायने में शिक्षित
करने की है। इन्हें मानवता और भारतीय जीवन मूल्यों के अनुरूप शिक्षित नहीं किया
गया तो आनेवाले समय में परिवार, समाज, राजनीति,
पर्यावरण जैसे अनेक क्षेत्रों में अनेक तरह की हिंसा, विघटन एवं विध्वंस अभी से कई गुणा बढ़ने वाले हैं।