Wednesday, May 2, 2018


विभाजन नहीं, विविधता चाहिए
जनतंत्र में चुनाव ही वह मौका होता है, जब मतदाता सत्ताधारी दल और विपक्षी दलों का हिसाब-किताब लेते हैं। वादों एवं विकास के मुद्दों पर उन्हें घेरते हैं और अपनी जरूरतों, उनकी घोषणाओं एवं संकल्पों पर संवाद करते हैं। कर्नाटक में विधानसभा चुनाव होने वाला है। पिछले पाँच सालों से मुख्यमंत्री सिद्धारमैया की कांग्रेस सरकार विकासात्मक कार्यों की डींगें हाँकती रही, मगर चुनाव के ठीक पहले ऐसी विभाजनकारी नीतियों को हवा दे दी है जो समाज, राज्य और देश के लिए घातक सिद्ध होने वाली हैं। उन्होंने सबसे पहले कर्नाटक राज्य के अलग झंडे की वकालत करते हुए केन्द्र सरकार को इसे मान्यता देने की माँग की, दूसरा लिंगायत समाज को हिन्दू धर्म से अलग धर्म की मान्यता देकर उसके लिए अल्पसंख्यक दर्जे की सिफारीश की।
लिंगायत शिव के उपासक हैं। इसकी स्थापना 12वीं सदी के समाज सुधारक और दर्शनशास्त्री संत बसवेश्वर के द्वारा हुई थी। संत बसवेश्वर का काल सभी तरह की संकीर्णताओं से आक्रांत था। बसवेश्वर बीच-बाजार और चौराहे के संत थे। वे आम जनता से अपनी बात पूरे आवेग और प्रखरता के साथ करते थे। जाति रहित समाज की स्थापना करने और भेदभाव तथा छुआछूत मिटाने के लिए उन्होंने ऊँची जाति ब्राम्हण कन्या रत्नाका विवाह नीची जाति के दलित, अस्पृश्य शीलवंतनामक युवक से करवाया। जिसका मूल्य उन्हें अपने सबसे प्रिय शिष्य के बलिदान से चुकाना पड़ा था। उन्होंने उसी काल में आदर्श संसद (अनुभव मंडप) का निर्माण किया था, जिसमें पुरुष और महिलाएँ तथा समाज के सभी वर्ग एवं जाति के लोगों की समान संख्या में भागीदारी थी। वे खुले वातावरण में बहस को प्रोत्साहित करते थे, जिसका रूप आज हमें संसदीय लोकतंत्र के रूप में देखने को मिलता है।
8वीं शताब्दी में दक्षिण भारत में जो अनेक भक्ति आंदोलन हुए, वहीं से लिंगायत समाज का उद्भव माना जाता है। लिंगायत यदा-कदा खुद को हिन्दू धर्म से अलग धर्म की मान्यता देने की माँग करते आये हैं। उनकी अपनी अलग पहचान को मुश्किल बनाता है उनमें और वीरशैव में समानता। हिन्दू धर्म में वीरशैव एक शैव समाज है। इसके अनुयायियों का मानना है कि संत बसवेश्वर लिंगायत समाज के संथापक नहीं, बल्कि एक समाज सुधारक थे, जो वीरशैव का हिस्सा है। वीरशैव जहाँ वेद और जाति व्यवस्था मानते थे, वहीं लिंगायतों ने शुरू से ही वेदों और जाति व्यवस्था को चुनौती दी।
हिन्दू धर्म को अनेक विद्वान अंग्रेजी के रिलीजन के अर्थ में धर्म न मानकर इसे हिन्दू संस्कृति की मान्यता देते हैं। सदियों से इसके अंदर से अनेक संप्रदाय बनते रहे, संग-संग पलते रहे, यहाँ तक कि एक दूसरे के विरुद्ध संघर्ष भी करते रहे, फिर भी एकमेव रहे। इस धर्म की खासियत ही सुधार के लिए संघर्ष, संवाद और सहअस्तित्व है। इस धर्म के लचीले स्वरूप में जब भी जड़ता की स्थिति निर्मित हुई, तब कोई न कोई महापुरुष ने आकर इसे गतिशीलता प्रदान कर इसकी सहिष्णुता को एक नई आभा से मंडित कर दिया। इस दृष्टि से प्राचीनकाल में बुद्ध और महावीर के द्वारा, मध्यकाल में शंकराचार्य, संत बसवेश्वर, गुरुनानक और चैतन्य महाप्रभु के माध्यम से तथा आधुनिक काल में राजा राम मोहन राय, स्वामी दयानन्द, स्वामी विवेकानन्द, महात्मा ज्योतिबा फुले, महात्मा गांधी तथा बाबा भीमराव अंबेडकर आदि अनेक सुधारकों के द्वारा किए गए प्रयास इस धर्म की धरोहर बन गए।
हिन्दू धर्मदर्शन में अनेक मत, संप्रदाय, धारा एवं वाद बनते रहे और इसकी उदारता से खुले आगोश में पुनः समाते चले गए। इसके अंदर वैष्णव, शैव तथा स्मृति हैं। वैष्णवों के अंदर अनेक उपसंप्रदाय हैं, जैसे वल्लभ, रामानंद आदि। उसी तरह शैव के अंदर दसनामी, नाथ, शाक्त आदि। सभी संप्रदाय एवं उपसंप्रदाय एक दूसरे से टकराते रहे हैं, फिर भी हिन्दू धर्म का हिस्सा बने रहे हैं। इसके अलावा चार्वाक का लोकायत दर्शन भी इसी धर्म का हिस्सा रहा है, जो न तो ईश्वर को मानता है और न ही किसी पूजा विधि को। दैहिक या भौतिक सुख ही इस दर्शन की सबसे बड़ी विशेषता है।
ऐसे में क्या चुनाव से ठीक पहले वोट की राजनीति के लिए कोई मुख्यमंत्री या सरकार हिन्दुओं को विभाजित कर नया धर्म बनाएगी? चुनावी फायदे के लिए कुछ सरकारी सुविधाओं का चारा डालकर उसे अल्पसंख्यक या पिछड़ा घोषित करेगी? क्या उनकी सरकार इसी तरह बौद्ध धर्म के संप्रदाय हीनयान, महायान, वज्रयान तथा नवयान को; जैन धर्म के दिगंबर और श्वेतांबर को; इस्लाम धर्म के शिया और सुन्नी को; ईसाइ धर्म के प्रोटेस्टैंट और रोमन कैथोलिक को पिछड़े का दर्जा देने के लिए अलग धर्म के तौर पर मान्यता देगी? उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश एन. संतोष हेगड़े ने सिद्धरमैया सरकार की आलोचना करते हुए कहा कि ‘‘किसी समुदाय को धर्म का दर्जा देने का काम सरकार का नहीं है। भारत के संविधान के तहत धर्मनिरपेक्ष सरकार है, वह किसी समुदाय के आंतरिक मामले में हस्तक्षेप करने का काम नहीं कर सकती।’’
इससे पहले सिद्धरमैया सरकार ने कन्नड़ लोगों की अस्मिता के नाम पर राज्य मंत्रिमंडल ने अलग झंडे को मंजूरी देकर गेंद केंद्र के पाले में डाल दी थी। लेकिन गृह मंत्रालय ने इसे खारिज करते हुए कहा कि झंडा कोड के तहत सिर्फ एक झंडे को मंजूरी दी गई है। इसलिए एक देश का एक झंडा ही होगा। जम्मू-कश्मीर का मामला अपवाद है, क्योंकि उसके लिए संविधान में अलग व्यवस्था है।
सवाल है कि चुनाव करीब आते ही उन्हें अलग लिंगायत समुदाय और कन्नड अस्मिता की चिंता क्यों सताने लगी? इसके पहले भी अनेक दल अनेक जाति एवं धर्म के लोगों को जो आरक्षण के दायरे में नहीं आते हैं, उनके सामने भी आरक्षण का चुग्गा डालकर वोट की फसल काटते रहे हैं। परंतु चुनाव के बाद यही वादे उनके गले की फाँस बनकर पूरे देश में जातिवादी हिंसा व नफरत का माहौल तैयार करते रहे हैं। हमारा समाज इतने सारे धर्मों, संप्रदायों, उपसंप्रदायों, जातियों, उपजातियों गोत्रों, कुलों और मूलों की अनन्त शृंखलाओं से बँधा है कि इसे जबरन छेड़ना हिंसा और अराजकता को ही न्योतना होगा। हर किसी को देश की विविधता में एकताका सम्मान करना चाहिए, न कि विभाजनकारी नीतियों को हवा देकर इसमें दरार पैदा करने का काम करना। बेहतर हो कि विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और नागरिक सुरक्षा जैसे सवाल हमारे चुनावों के मुख्य मुद्दे बनें। हमें विविधताओं से भरा भारत चाहिए, विभाजित भारत नहीं।



संसद में संवाद नहीं!
लोकतंत्र की संसदीय प्रणाली में संसद को देश की राजनीतिक, सामाजिक  आर्थिक व बहुविध आंतरिक व बाह्य स्थितियों का दर्पण माना जाता है, यानी संसद में पूरे देश के मुद्दों एवं हलचलों का प्रतिबिंब दिख जाता है कि देश किन परिस्थितियों से गुजर रहा है। परंतु लगातार कुछ वर्षों से संसद के बनावटी हुड़दंग और हंगामे को देखकर यही लगता है कि हमारे चुने गए प्रतिनिधियों को या तो जनता की अपेक्षाओं या आकांक्षाओं की समझ नहीं है या वे जानबूझकर किसी स्वार्थी हित के हाथों जनतंत्र व संसद की मर्यादा को मटियामेट कर रहे हैं। इसकी झाँकी इस महत्त्वपूर्ण बजट सेशन में देखने को मिल रही है, जिसमें विरोधी दलों द्वारा इस कदर हंगामा किया जा रहा है कि अनेक जरूरी विधेयकों एवं कार्यों की बात अगर छोड़ भी दें, यहाँ तक कि देश के भविष्य को तय करने वाला बजट तक लोकसभा में बिना कोई चर्चा-बहस के पारित हो गया। हद तो तब हो गई, जब इराक के मोसुल में आईएसआईएस के हाथों चार साल पहले बेरहमी से मारे गए 39 भारतीयों की पूरी जानकारी विदेश मंत्री सुषमा स्वराज लोकसभा में देना चाह रही थीं तो उन्हें बोलने तक नहीं दिया गया।
लोकसभा ने बिना चर्चा के ही वित्त विधेयक और विनियोग विधेयक 2018 को मंजूरी दे दी। इससे पहले विभिन्न मंत्रालयों और विभागों की 99 माँगों को गिलोटिन के जरिये मंजूरी दी गई। हाल के वर्षों में शायद यह पहला मौका है, जब पूरा बजट बिना चर्चा के लोकसभा में पारित हुआ हो। बजट को बिना बहस के पारित होना देश और लोकतंत्र के लिए उचित नहीं है। बजट सिर्फ आमदनी और खर्च का ब्योरा भर नहीं होता बल्कि पिछले वर्षों की शासकीय वित्तीय कार्यनीतियों और उसकी खामियों की समीक्षा, सुधार एवं सुझावों का दस्तावेज एवं देश के भविष्य का दिशा-निर्देश भी होता है। संसद सदस्यों, खासकर विपक्षी सदस्यों से यह अपेक्षा रहती है कि इसके हर पहलू का गहराई से अध्ययन एवं विश्लेषण कर इसके अंदर छुपे अनेक अव्यक्त प्रावधानों एवं तथ्यों को जोरदार बहस के माध्यम से उजागर करें, सरकार को घेरें एवं सुधार व जवाबदेही के लिए मजबूर कर दें। सरकार कई बार अपने दलीय हित या अनेक दवाब समूहों के फायदे के लिए बजट में दबे-छुपे कुछ ऐसा प्रावधान कर जाती है, जो देश के लिए नुकसानदायक साबित हो सकता है। परंतु यह कितना दुःखद है कि वित्तीय वर्ष की समयसीमा तथा विपक्षी सदस्यों की अनावश्यक अलोकतांत्रिक हुल्लड़बाजी में वित्त एवं विनियोग विधेयक यों ही बिना बहस के पारित हो गया।
एक दूसरा अत्यंत दुःखदायी विषय, विदेश मंत्री सुषमा स्वराज इराक के मोसुल से अगवा हुए 39 भारतीय नागरिकों की मौत की जानकारी लोकसभा में दे रही थीं, किंतु कांग्रेस के सांसदों द्वारा किए जा रहे अनावश्यक हंगामे के कारण वे पूरी जानकारी नहीं दे पायीं। असफल रहने पर उन्होंने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर कहा कि, ‘‘कांग्रेस ने मौत पर ओछी राजनीति की सारी हदें पार कर दीं, कांग्रेस पार्टी ने लोकसभा काररवाई को उस समय बाधित क्यों किया गया, जब मुझे इराक में मारे गए 39 भारतीयों की जानकारी देनी थी?’’ बयान के दौरान लोकसभा में कांग्रेस द्वारा हंगामे का नेतृत्व कांग्रेस के ज्योतिरादित्य सिंधिया ने राहुल गांधी के इशारे पर किया और लोकसभा अध्यक्ष द्वारा बार-बार आग्रह करने के बावजूद सिंधिया के नेतृत्व में कांग्रेस सदस्यों का शोर-शराबा जारी रहा। प्रेस कॉन्फ्रेंस में विदेश मंत्री ने बताया कि मृतकों में पंजाब के 27 लोग, हिमाचल के 4, बिहार के 6 और बंगाल के 2 लोग शामिल हैं।
इराक के मोसुल में 39 भारतीय कामगारों के जीवित होने की जिस झीनी-सी संभावना पर सैकड़ों विवश परिजनों की उम्मीद टिकी थी, वह एक झटके में टूट गई। यह त्रासदी चार साल पहले घटित हुई, पर उसकी पुष्टि अब हुई। काम की तलाश में दूसरे देश जाकर समूह में आतंकियों के हाथों मारे जाने से दुःखद कुछ नहीं हो सकता, लेकिन मौत के करीब चार साल तक उनके बारे में पता न चल पाना तो और भी दुर्भाग्यपूर्ण था। इस मामले में भारत सरकार चाहकर भी बहुत कुछ नहीं कर सकती थी। आईएस के कब्जे के दौरान मोसुल में जब इराक सरकार की ही पहुँच नहीं थी, तो बाहरी देशों की बात ही क्या? मोसुल के आईएस के कब्जे से मुक्त होते ही हमारी सरकार उनकी तलाश में सक्रिय हुई। रडार की मदद से एक गाँव के टीले पर सामूहिक कब्र का पता चला और निकाले गए शवों के डीएनए टेस्ट से मिलान कराने के बाद उनके भारतीय होने की पुष्टि हुई।
सबसे बड़े लोकतंत्र के प्रतिनिधि हे महानुभावो! अगर बजट और वित्त विधेयक जैसे महत्त्वपूर्ण दस्तावेज भी बिना आपकी बहसों के ही पारित हो जाते हैं। चार वर्षों से आशा और निराशा के भँवर में गोते खाते उन सैंकड़ों परिवारों तक 39 लोगों की निर्मम हत्या की पुष्ट खबर पहुँची, तब भी आपकी अंतरात्मा नहीं जगी। आपसे तो आशा थी कि सारी दलीय कटुता को परे रखकर तत्काल इस हत्या के पीछे के कारणों की चर्चा करते, सरकार की नीतियों में कोई खामी है तो उसे उजागर कर ऐसी घटनाओं के निवारण के लिए मजबूर करते। परंतु चर्चा-संवाद की तो बात ही दूर, आपने तो मंत्री महोदया को पूरी बात ही कहने नहीं दी। जिनके अवशेष के रूप में सिर्फ हड्डिया, उनके कड़े, केश, कंघे, जूते, कपड़े उनकी सुरक्षा के लिए माताओं, बहनों और पत्नी द्वारा बाँधे गऐ गंडे-ताबीज ही अवशेष बचे हैं, उनकी आत्मा की शांति के लिए तथा उनके आश्रित-पीड़ित परिवारों के गहरे घावों पर मरहम लगाने के लिए आपलोगों ने दो मिनट की मौन श्रद्धांजलि देना भी उचित नहीं समझा। वे बेचारे 25 से 30 हजार रुपये महीना कमाने के चक्कर में उस बियाबान में दरिंदों के हाथों निर्ममता से मारे गए और आपलोग जनता की गाढ़ी कमाई के करोड़ों रुपये हंगामे की भेंट प्रतिदिन चढ़ा रहे हैं। आप पर अगर इन दुखियारों की पीड़ा का भी असर नहीं हो रहा तो जनतंत्र के इस संप्रभू मंदिर में चुनकर आए महानुभावो, एक बार सोचिए, आप किसका प्रतिनिधित्व कर रहे हैं? हो सकता है, आप जिन मुद्दों पर बाधा उत्पन्न कर रहे हैं, वह भी महत्त्वपूर्ण हो, परंतु उसका भी समाधान तो वाद-प्रतिवाद-संवाद और नीति-निर्माण से ही निकलेगा न। फिर संसद में संवाद और संवेदनशीलता की जगह हंगामा क्यों?