Tuesday, June 6, 2017

लोकतांत्रिक प्रक्रिया से ही निकलेगा शाश्वत समाधान
जनतांत्रिक प्रक्रिया भले ही कभी-कभी बड़ी ही विलंबित और उलझाऊ महसूस होती हो, परंतु इस पर विश्वास करने वाले समाज को पता होता है कि इस प्रक्रिया से जो समाधान सामने आता है, वह टिकाऊ और शाश्वत होता है। इसको समझने के लिए भारत का स्वतंत्रता आंदोलन तथा आजादी के बाद संसदीय जनतंत्र से निकलकर आए अनेक सुधारों को सूक्ष्म विवेचना की जरूरत पड़ेगी। इसे आसान तरीके से समझने के लिए वर्तमान में देश की दो अति विवादास्पद तथा जटिल आर्थिक, राजनीतिक तथा सामाजिक समस्याओं को सुलझते देखकर समझा जा सकता है, पहला, टैक्स संबंधी जीएसटी कानून का कार्यरूप में आना तथा दूसरा, मुस्लिम महिलाओं से जुड़ी तीन तलाक की समस्या।
श्रीनगर में जीएसटी यानी वस्तु व सेवा कर परिषद् ने जिस तरह इसकी दरों को तय किया है, उससे काफी उम्मीद जगती है। परिषद् ने कोशिश की है कि जीएसटी दरें लागू हांे तो आम लोगों की तकलीफ न बढ़े बल्कि उनकी दैनिक जिंदगी पहले से और सहज ढंग से चलती रहे। वस्तुओं एवं सेवाओं के बीच का अंतर समाप्त करने का विचार एवं कर प्रणाली सरल एवं पारदर्शी बने, यही जीएसटी के मूल में है। यह विचार सन् 1994 में अमरेश बागची की रिपोर्ट रिफॉर्म ऑफ डोमेस्टिक ट्रेड टैक्सेस इन इंडिया: इश्यूज ऐंड ऑप्शंसकेन्द्र सरकार के सामने पेश की गई थी। वर्ष 2000 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने इसे लागू करने के लिए राज्यों के वित्त मंत्रियों की एक अधिकार प्राप्त समिति बनाई थी।
यद्यपि उस समय की अटल सरकार अल्पमत व राजनीतिक दा वपेंच के चलते इस बिल को पास नहीं करा पाई थी। उसके बाद यूपीए सरकार के वित्तमंत्री पी. चिदम्बरम द्वारा 2007 में जीएसटी के लिए राज्यों के वित्तमंत्रियों की संयुक्त समिति का गठन कर वर्ष 2010 से इसके लागू करने की घोषणा की। तत्कालीन कांग्रेस सरकार द्वारा मार्च, 2011 में 115वाँ संविधान संशोधन विधेयक पेश किया गया, जो अनेक अवरोधों एवं मतभेदों के कारण पारित नहीं हो सका। भाजपा की नरेंद्र मोदी सरकार ने जीएसटी को अपने आर्थिक सुधारों का केंद्रबिंदु बताया तथा 122वाँ संविधान संशोधन विधेयक दिसंबर, 2014 में संसद में पेश किया, जिसे लोकसभा द्वारा मई, 2015 में पारित कर दिया गया था। किन्तु राज्यसभा में एनडीए के अल्पमत में होने के चलते व विपक्ष का रचनात्मक सहयोग नहीं होने के कारण राज्यसभा में इस बिल का भविष्य उज्ज्वल नहीं दिख रहा था। यह सरकार व वित्तमंत्री अरुण जेटली की संसदीय कुशलता का परिणाम ही है कि लोकसभा के बाद, वह बिल 3 अगस्त, 2016 को राज्यसभा में भी सम्पूर्ण उपस्थित सदस्यों के इकतरफा समर्थन से पारित हुआ। इस चुनौती को पार करते हुए जिस तरह सरकार अब आम सहमति से अनेक विपक्षी दलों वाली राज्यों की विधान सभाओं से भी पास करा पाई और करा रही है, यही जनतंत्र की जीत है।
दूसरी तीन तलाक की समस्या, जो कि मुस्लिम महिलाओं के जीवण-मरण से जुड़ा सवाल है। करीब तीस साल पहले तीन तलाक पर सर्वोच्च न्यायालय ने शाह बानो के पक्ष में फैसला दिया था। परंतु इस फैसले का मुस्लिम कट्टरपंथियों ने भारी विरोध किया। तत्कालीन राजीव गांधी सरकार ने कट्टरपंथी मुस्लिम धर्मगुरुओं के दबाव में आकर मुस्लिम महिला अधिनियम, 1986 पारित कर शाह बानो के पक्ष में आया न्यायालय का फैसला पलट दिया। लगभग तीस साल बाद, उत्तराखंड के काशीपुर की रहने वाली शायरा बानो का साल 2002 में इलाहाबाद के रिजवान अहमद से निकाह हुआ, ससुराल में उसको अनेक तरह की शारीरिक और मानसिक प्रताड़नाएँ दी गईं और अंततः 2015 में तीन तलाकदेते हुए उससे रिश्ता ही समाप्त कर लिया। इसी तलाक की वैधता को चुनौती देते हुए शायरा सर्वोच्च न्यायालय पहुँची। याचिका के माध्यम से मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरियत) एप्लीकेशन एक्ट, 1937की धारा 2 की संवैधानिकता को चुनौती दी गई। यही वह धारा है, जिसके जरिये मुस्लिम समुदाय में बहुविवाह, ‘तीन तलाक’ (तलाक-ए-बिद्दत) और निकाह-हलालाजैसी प्रथाओं को वैध्यता मिलती है।
इस मामले का संज्ञान लेते हुए सर्वोच्च अदालत को पूरा अहसास था कि उसे एक बहुत नाजुक और विवादित विषय पर सुनवाई करनी है। इसलिए उसने मामले को पाँच जजों की संवैधानिक पीठ को सौंपा, जिसमें अलग-अलग धार्मिक पृष्ठभूमि के जज शामिल किए गए। पहली बार इस मसले पर केंद्र की भाजपा सरकार ने अपने हलफनामे में सरकार ने तीन तलाक को मजहब के नजरिए से नहीं बल्कि स्त्री-पुरुष के समान अधिकार के नजरिए से देखने की वकालत की। इसके अलावा, मुसलिम समाज के भीतर से भी तीन तलाक की आलोचना के स्वर उठने लगे हैं।
सर्वोच्च न्यायालय में तीन तलाक के मसले पर चली सुनवाई की सार्थकता दिखने लगी है। न्यायालय का फैसला क्या होगा, यह तो फैसला आने के बाद पता चलेगा, पर ऑल इंडिया मुसलिम पर्सनल लॉ बोर्ड के रुख में बदलाव साफ लक्षित किया जा सकता है। इस सुनवाई के दौरान न्यायालय की सख्त टिप्पणियों, केन्द्र सरकार के मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों के पक्ष में खड़े होने के कठोर रुख तथा जनमानस तथा मीडिया के मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों के प्रति संवेदनशीलता का ही असर है कि कल तक जो बोर्ड तीन तलाक के मुद््दे को अदालत के न्यायाधिकार क्षेत्र से बाहर बताता रहा, अब उसके सुर बदल गए हैं। उसने सर्वोच्च अदालत में दाखिल किए अपने नए हलफनामे में कहा है कि महिलाओं को तीन तलाक न मानने का अधिकार भी मिलेगा। दुलहन निकाहनामे में संबंधित शर्त जुड़वा सकेगी। यही नहीं, काजी दूल्हा-दुलहन को समझाएगा कि तीन तलाक न कहने की शर्त निकाहनामे में शामिल करेंगे तथा बोर्ड तीन तलाक का बेजा इस्तेमाल रोकने के लिए जागरूकता मुहिम चलाएगा।

80 के दशक में शाह बानो मामले को अलोकतांत्रिक तरीके से एक वर्ग की कट्टरवादी सनक को मान्यता देने के लिए कानून बनाकर मुस्लिम महिलाओं को तीन तलाक के वज्रपात के आगे बेसहारा और बेचारगी में तिल-तिल कर जिस तरह से मरने को विवश किया गया था, उसे तो फिर से उभरना ही था। यह तो हमारे जीवंत जनतंत्र का परिणाम है कि स्थाई समाधान तक प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से विविध संस्थाएँ सक्रिय रहती हैं और परस्पर विरोध, संवाद और समाधान की प्रक्रिया निरंतर चलती रहती है। विपरीत परिस्थितियों में भी जटिलताओं और मतभेदों को पाटती रहती हैं। कभी कार्यपालिका, संसद, न्यायपालिका, मीडिया तो कभी-कभी सड़क से उठती आवाज से भी समाधान के रास्ते निकलते रहते हैं। चाहे जीएसटी हो या तीन तलाक या फिर लंबा इंतजार कराता विलंबित लोकपाल, शाश्वत समाधान का माध्यम तो जनतंत्र ही है।
लालबत्ती के स्याह पक्ष
आजादी के बाद देश के संविधान और कानून ने लोकतांत्रिक सरकार और शासन के हाथ में सत्ता का प्रकाश-स्तंभ इसलिए थमाया कि अब तक दरिद्रता, अशिक्षा, बीमारियों, अंधविश्वासों तथा अनेक प्रकार के जाति, धर्म, वर्ण और वर्गों के आधार पर विभेदकारी नीतियों के कारण हाशिए पर जीने को मजबूर लोगों के घरों और मनों में जड़ जमाए स्याह अँधेरे से मुक्ति और सुराज मिले। वह भी आलोकित होकर बिना अटके, बिना भटके देश की प्रगति और विकास की यात्रा में शामिल हो जाए। परंतु दुःखद स्थिति यह हो गई कि जिन्हें यह जिम्मेदारी दी गई, वही पहले अपने और अपने परिवार के लिए भरपूर रोशनी की व्यवस्था करने लगे; उसके बाद ऐसे लोगों को जो सदा से प्रकाशित थे, उन्हें ही गलत ढंग से हर क्षेत्र में निर्बाध रूप से आगे बढ़ने के भरपूर अवसर दिए जाने लगे। ऊपर से कोढ़ में खाज यह कि सत्ताधारी वर्ग सत्ता-सुविधा की भरपूर चमक-दमक के अतिरिक्त अपने सिरों पर लालबत्ती भी लाद ली।  परिणाम यह हुआ कि सदियों से अँधेरों में रोशनी की तलाश में बिलबिलाता समाज इस लाल रक्तिम रोशनी के भय से और दूर होता हुआ अंधकूप में समाता चला गया।
ऐसे समय में जनता का चौकीदार और जनता के प्रधानसेवक बनने के वादे से शासन में आनेवाले प्रधानमंत्री और केन्द्र सरकार का लालबत्ती हटाने समेत और अन्य कई फैसलों से एक आशाजनक  संकेत मिल रहा है। यह निश्चय ही जनतांत्रिक मूल्यों के पक्ष में केंद्र सरकार का एक ऐतिहासिक फैसला है कि एक मई से किसी भी गाड़ी के ऊपर लाल बत्ती नहीं होगी। यों कोई व्यवस्था कितनी भी जनतांत्रिक और समतावादी हो, शीर्ष पदों पर आसीन व्यक्तियों को कुछ विशिष्ट अधिकार हासिल होते हैं, इसी के अनुरूप उन्हें विशेष सुविधाएँ भी मिली होती हैं। इसका आमतौर पर बुरा नहीं माना जाता। परंतु सातवें दशक से मंत्रियों और नेताओं का सुरक्षा संबंधी तामझाम बढ़ने लगा और लालबत्ती लगी गाड़ियों का दायरा भी। यहाँ तक कि मंत्री और अधिकारियों के परिवार और रिश्तेदार तक बेधड़क इसका दुरुपयोग कर सब पर रोब गाँठते दिखाई पड़ने लगे।
यूरोप के कई देशों के प्रधानमंत्री आज भी साइकिल पर चलना पसंद करते हैं, जिनमें नॅार्वे नीदरलैंड्स, ब्रिटेन आदि के प्रधान मंत्री, मंत्रीगण, सांसद तथा अनेक विशिष्टजन शामिल हैं वे सार्वजनिक लोकल ट्रेनों एवं बसों में आम लोगों के साथ बड़े सहज ढंग से यात्रा करते हैं। इसके उलट हमारे देश में शिवसेना के सांसद रवींद्र गायकवाड़ जैसे अनेक महानुभाव हैं, जो साठ साल के बुजुर्ग विमानसेवा कर्मचारी की चप्पलों से धुनाई यह कहते हुए कर देते हैं कि एक कर्मचारी उन्हें यह याद दिलाने की गुस्ताखी कैसे कर सकता है कि उड़ान में बिजनेस क्लास नहीं है। वह भला साधारण लोगों की तरह कतार में लगने और आम दर्जे में यात्रा कैसे कर सकते हैं? बेशर्मी की हद तो तब हो जाती है कि इसके कारण संसद में भी इनके दल द्वारा कई दिनों तक अवरोध पैदा किया जाता है।
यह लालबत्ती वाली मानसिकता सिर्फ गाड़ी की बत्तियों तक सीमित नहीं है बल्कि शासन के हर स्तर और हर क्षेत्र में दिखती रही है। चाहे शिक्षा को लें, स्वास्थ्य सुविधाओं को लें, यातायात व्यवस्था को ले लें या फिर अन्य कोई सामान्य से सामान्य नागरिक सेवा। शिक्षा के क्षेत्र में आम नागरिकों के बच्चों के लिए सरकारी स्कूलों का हाल यह है कि न तो ढंग के शिक्षक उपलब्ध हैं न ही अन्य सुविधाएँ जबकि मंत्रियों, सरकारी अधिकारियों एवं अमीरों के बच्चों के लिए संस्कृति स्कूल, पांचसितारा सुविधाओं से युक्त अनेक पब्लिक स्कूलों से लेकर विदेशों तक की शिक्षा सहज उपलब्ध है। स्वास्थ्य के क्षेत्र में और भी बुरा हाल है। आम गरीब मामूली बीमारी होने पर समय पर सही इलाज नहीं मिलने के दर-दर की ठोकरें खाकर मरने को मजबूर होता है जबकि सरकार और शासन तथा अमीरों के लिए सरकारी अस्पताल से लेकर अनेक मंहगे अस्पताल उनकी सेवा में चौबिसों घंटे तत्पर रहते हैं। यातायात के साधनों में भी हर जगह वीआईपी लालबत्ती मानसिकता हावी है। जहाँ विशिष्ट लोगों के लिए पैसे एवं मुफ्त कोटे पर आराम की सारी सुविधा उपलब्ध हैं वहीं आमजनों को जानवरों से भी बदतर हालात में जान को जोखिम में डालकर यात्रा करनी पड़ती है।
आशा है, सरकार एवं शासन के कर्ता-धर्ता अब हर स्तर पर जनता से जुड़ी मौलिक जरूरतों के साधनों के द्वार सहज ढंग से खोलेंगे और अपने कर्तव्य, जिसे सत्ता के माध्यम से उन्हें संविधान और कानून नें सौंपा है उसका निर्वहन करेंगे। आगे जल्द से जल्द पूरे देश में ऐसी व्यवस्था होगी कि सबके लिए समान स्कूल की व्यवस्था होगी, जिसमें साधारण व्यक्ति के घरों के बच्चों के लेकर सत्ता के शिखर पर बैठे व्यक्ति के बच्चे एक साथ पढ़ें, सभी व्यक्तियों को सहज और समान जरूरत के अनुरूप स्वास्थ्य सेवाएँ मिलंे।
हमारे यातायात के साधनों का भी जनतांत्रिकीकरण हो। दिल्ली मेट्रो इसका बहुत बढ़िया उदाहरण है। यह सभी वर्ग के लोगों को संग-साथ चलना सिखा रही है। ऐसा करने के लिए उन्हें मेट्रो की कार्यप्रणाली ने उनको मजबूर किया है। जहाँ तक सुविधाओं की बात है तो गरमी, सर्दी से बचाव और सुरक्षित माहौल किस इंसान की जरूरत नहीं है? संग-साथ चलने का यही फार्मूला कुछ बडे स्तर पर भारतीय रेल एवं अन्य साधनों में भी क्यों नहीं अपनाया जा सकता है? जहां सामान्य और विशिष्ट सभी संग साथ होकर एक ही तरह की सामान्य सुविधाओं का प्रयोग करते हुए चलें। इसके लिए राजनीतिक एवं सामाजिक मानस में बदलाव की आवश्यकता है।
प्रधानमंत्री, उनकी केबिनेट, तथा कई मुख्यमंत्रियों ने कुलीन मानसिकता की प्रतीक लालबत्तियों को गाड़ियों से हटाने की जो मुहिम छेड़ी है, उसके प्रतीकात्मक, सकारात्मक महत्त्व से इंकार नहीं किया जा सकता। परंतु यह मुहिम तभी अपना मुकाम हासिल कर पाएगी जब सेवाओं एवं सामान्य आधारभूत मौलिक जरूरतों तक सबकी बिना भेद-भाव के सहज और समान, निर्बाध भागीदारी सुनिश्चत होगी। तभी देश को लालबत्ती के स्याह पक्ष से मुक्ति मिलेगी और सही मायने में सुराज स्थापित होगा।
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