Friday, February 12, 2016

आग बुझाने वाले समाज का हो अभिनंदन

हर समाज में दो तरह के लोग होते हैं, एक आग लगाने वाले और दूसरे बुझाने वाले। आग लगाने वाले लोग बड़े ही स्वार्थी, संकुचित, धर्मांध, जातिवाद और अनेक प्रकार के दकियानूसी विचारों से ग्रसित होते हैं, जबकि आग बुझाने वाले लोग उदार, समाजहित को देखने वाले एवं जनतांत्रिक मूल्यों से संचालित होते हैं। कोई भी समाज कितना लोकतांत्रिक, समानतावादी एवं उदारवादी है, यह इस बात से ही तय होता है कि उस समाज में कैसे लोगों का बोलबाला है। अगर उदारवादी प्रबुद्ध लोग ताकतवर हैं तो वे आग लगाने वाले लोगों के विध्वंसात्मक कार्यों पर घड़ों पानी डालकर पुनर्निमाण करते हुए नकारात्मक लोगों को भी सोचने पर मजबूर कर देंगे कि उनका रास्ता सही नहीं है। इसके उलट अगर समाज में दकियानूसी कट्टरपंथी लोगों का आधिपत्य होगा तो वे किसी न किसी बहाने से समाज में विध्वंसात्मक कार्यों को ही अंजाम देते रहेंगे और उदारपंथियों को किनारे कर पूरे समाज को गर्त में गिरा देंगे। हाल के दिनों में देश में दो ऐसी घटनाएँ घटी हैं, जिनके विश्लेषण से हम बखूबी इस बात को समझ सकते हैं।
पहली आग लगाने वाली घटना 3 जनवरी को मालदा के कलियाचक की है। जिसमें मुस्लिम समूदाय के लाखों की संख्या में उत्तर प्रदेश के एक हिंदू संगठन के कथित सदस्य के महज एक आपत्तिजनक बयान के विरोध में जमकर हिंसा और उत्पाद मचाया। कलियाचक में इकट्ठा हुई उग्र भीड़ ने न केवल पुलिस थाने को आग के हवाले कर तहस-नहस कर दिया, बल्कि बीएसएफ के कई वाहनों समेत सरकारी संपत्ति को भी आग के हवाले कर दिया। यहाँ तक कि उस क्षेत्र में हिन्दू अल्पसंख्यकों के घरों और दुकानों में जमकर लूटपाट की, मंदिर एवं उसके पुजारी पर भी हमला किया। उनके इस हिंसा के आगे वहाँ का प्रशासन, राजनीतिक प्रतिनिधि, यहाँ तक कि मीडिया के मुँह पर भी या तो ताला पड़ा रहा या मामले को झुठलाने या दबाने में लगे रहे।
अब दूसरी आग बुझाने वाली घटना चक्रधरपुर’ (प.सिंहभूम) झारखंड की है। घटना यह है कि ३ जनवरी की शाम कुछ नवयुवक पिकनिक से लौटते समय डीजे के तेज संगीत पर जय श्री राम का नारा लगाते हुए आ रहे थे, कुछ उग्र मुस्लिम युवकों ने गाड़ी पर पथराव कर दिया, मामला हाथापाई से मारपीट तक बढ़ा और सांप्रदायिक रंग ले लिया। दोनों समुदाय के सैकड़ों लोग नारेबाजी और पथराव करते हुए शहर के मुख्य चौराहे तक आ गए। इधर प्रशासन इस भीड़ को काबू करने में व्यस्त रहा, उधर कुछ उपद्रवी तत्वों ने मुस्लिम बाहुल्य गुदड़ी बाजार में आग लगा दी, मिनटों में दर्जनों दुकानें जल कर खाक हो गईं। आग की लपटों ने शहर में व्याप्त साम्प्रदायिक तनाव को अपने चरम पर पहुँचा दिया।
प्रशासन ने तत्परता दिखाते हुए शहर को अर्धसैनिक बालों के हवाले कर दिया। चाईबासा से दमकल को चक्रधरपुर पहुँचने में घंटों लग गए। ठीक इसी समयावधि में आगे आया इस शहर के प्रबुद्ध नागरिक समाज का चेहरा। मुसलमानों की दुकानों में लगी इस आग को बुझाने के लिए, इस कड़ी ठण्ड में भी सैंकड़ों हिन्दुओं ने बिना किसी खतरे की परवाह किए जी-जान लगा कर दमकल के आने तक आग को फैलने से रोके रखा। 
घटना के दूसरे दिन लोग भय, आशंका और दुःख के कारण अपने अपने घरों में दुबके रहे, शहर में धारा 144 लगा दी गई, दुकानें व अन्य प्रतिष्ठान बंद रहे, दोनों समुदाय के प्रभावित लोगों ने रात सीआरपीएफ की निगरानी में किसी तरह काटी।
अगली सुबह हुई एक क्रांतिकारी विचार के साथ शहर के कुछ सम्मानित प्रबुद्ध लोगों ने, जिन में विशेषकर मारवाड़ी, व्यापारी वर्ग और कुछ समाजसेवी शामिल थे, ने विचार रखा- ‘‘क्या ही बेहतर हो कि इस आगजनी में हुए आर्थिक नुकसान को हम सब मिल कर साझा कर लें, हम उनके नुकसान की पूरी भरपाई तो नहीं कर सकेंगे किंतु इस घड़ी उनके जले पर मरहम जरूर रख सकते हैं। अपने-अपने त्योहारों के अवसर पर जब हम लाखों जमा कर सकते हैं तो इस दुःख की बेला में क्यों नहीं? ये उन उपद्रवी लोगों के मुँह पर एक करारा तमाचा भी होगा, जो हमारे सभ्य समाज और देश की शांति, सौहार्द और भाईचारे को नुकसान पहुँचाना चाहते हैं।
रेड क्रॉस सोसाएटी, मारवाड़ी युवा मंच, सीकेपी व्यापारी संघ, गुदड़ी बाजार समिति, मुस्लिम सेंटल अंजुमन कमिटी, नगरपालिका परिषद, प्राथमिक शिक्षक संघ, विभिन्न स्कूल और धार्मिक संस्थान विशेषकर जामा मस्जिद और कांसेप्ट पब्लिक स्कूल के सदस्य इस नेक काम में हाथ बँटाने आगे आ गए, लोगों ने पाँच सौ से पचास हजार रुपये तक चंदा दिया। वही लोग जो बदले की भावना में उबल रहे थे, अपनी उर्जा को चंदा उगाही की इस मुहिम से जोड़ कर प्रभावित दुकानदारों को राहत पहुँचाने में विसर्जित कर दिया।
मेरे मित्र इंतखाब आलम जिन्होंने सोशल मीडिया पर बढ़-चढकर इस प्रयास को प्रसारित किया, ने बताया, ‘‘स्वयं वे दुकानदार जिनका माल जल कर खाक हो गया था, और जिनके बच्चे चीख-चीख कर कह रहे थे, हिन्दुओं ने हमारी दुकानें जला दीं...। हिन्दुओं द्वारा शुरू की गई इस मुहिम की तारीफ करने लगे। अद्भुत था ये नजारा, कल तक जहाँ आग, बदला और विध्वंश की बातें हो रहीं थीं, वहीं आज निर्माण, प्रेम और भाईचारे की चर्चा गली-गली होने लगी।’’
सामाजिक सद्भाव के इस कार्य में सभी धर्म, समुदाय, वर्ग और दल के लोग शामिल थे, यहाँ तक कि भाजपा, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, कांग्रेस, जनता दल, झामुमो जैसे धुर विरोधी राजनीतिक विचारधारा के सदस्य और समर्थक भी कन्धा से कन्धा मिलाकर इस मुहिम में अपना सहयोग देते नजर आए। कुछ दिनों में ही सात लाख रुपया जमा कर, प्रशासन के सहयोग से उन प्रभावित लोगों के बीच वितरित कर दिया गया, जिनके सारे सपने इस आग में जल कर खाक हो गए थे।
कोई भी समाज ऐसा नहीं होता, जिसमें कुछ स्वार्थी, नकारात्मक सोच वाले न हों, परंतु अगर हमारा लोकतांत्रिक सभ्य समाज मजबूत हो तो नकारात्मक विचारों की विषबेल फैलाने वाले लोगों की एक नहीं चलती है। इसलिए आज आवश्यकता इस बात की है कि हम एक सभ्य लोकतांत्रिक समाज को बढ़ावा दें ताकि पहले तो कोई आग लगा ही न पाये और लगा भी दे तो उसे मालदा जैसे आँख मूंदकर धू-धूकर जलने के लिए न छोड़कर चक्रधरपुर जैसे फैलने से पहले रोककर पुनर्निर्माण कार्य प्रारंभ कर दिया जाए। हमें चक्रधरपुर के नागरिक समाज का अभिनंदन करना चाहिए।