कल्पवृक्ष बना वंशवृक्ष
भारतीय
जनमानस में बहुत गहरे तक यह व्याप्त है कि कल्पवृक्ष से जिस वस्तु की भी याचना की
जाए, वह उसे यह दे देता है। इसका नाश कल्पांत तक
नहीं होता। कल्पवृक्ष देवलोक का एक वृक्ष है। पुराणों के अनुसार समुद्रमंथन से
प्राप्त 14 रत्नों में कल्पवृक्ष भी था। यह इंद्र को दे
दिया गया था और इंद्र ने इसकी स्थापना सुरकानन में कर दी थी। यही कारण है कि हम
भारतीय अनेक वृक्षों को कल्पवृक्ष मानकर पूजा करते हैं और कामना करते हैं कि उसकी
कृपा से हमारी सारी मनोकामनाएँ पूरी हो जाएँगी। यह कल्पना या विश्वास कुछ इसी तरह
का है जैसा कि महात्मा गांधी का रामराज्य की अवधारणा। स्वतंत्रता के समय देश की
अधिकांश जनता ने गांधी जी एवं अनेक जननेताओं के नेतृत्व में स्वतंत्रता आंदोलन में
हिस्सा लिया और अनेकों कुर्बानियाँ इस सोच के साथ दीं कि कांग्रेस नामक कल्पवृक्ष
के छाया तले सबके प्रयासों से गुलामी से मुक्ति मिलगी और ‘राम राज्य’ कायम
होगा।
सदियों
की गुलामी से मुक्ति मिली। अपने लोगों के हाथ में शासन की बागडोर भी आ गई। गांधी
का कांग्रेस जो कभी विविध वृक्षों का बागीचा था वह शासन में आते ही ‘राष्ट्रीय वृक्ष’ बरगद
की भूमिका में आ गई बरगद के वृक्ष की शाखाएँ दूर-दूर तक फैली हुई तथा जड़ें गहरी
होती हैं। जड़ों और तने से और शाखाएँ बनती हैं। इसके इस विशेषता के कारण इसे ‘अक्षय वट’ भी
कहा जाता है, क्योंकि यह पेड कभी नष्ट नहीं होता है। इसकी
छाया तले पशु-पक्षी एवं अनेक जीव-जंतु सुकून, भोजन
एवं आवास पाते हैं और कल्पवृक्ष का एहसास करते हैं। आज भी गाँव के लोग इसी पेड़ की
छाया में पंचायत करते हैं, यह मानकर कि यहाँ नीर-क्षीर-विवेक होगा
और इंसाफ मिलेगा।
परंतु
आजादी के छः दसकों बाद लोगों का यह भ्रम अब पूरी तरह से टूट गया है कि जिस
कांग्रेेस रूपी ‘कल्पवृक्ष’ ने
उन्हें ‘रामराज्य’ का
सपना दिखाया था वह स्वप्न ही बनकर रह गया। कांग्रेस जिस बरगद को कल्पवृक्ष मानकर
जनता को यह विश्वास दिलाती रही कि बरगद के समान ज्यों-ज्यों वह पुरानी होगी
त्यों-त्यों उसके नये बरोह धरती की ओर फैलता जाएगा व नयी जड़ बनकर उसकी शाखा पूरे
देश में फैल जाएगी। उसके तले सारे देश का ‘रामराज्य’ का सपना साकार होगा। परंतु हुआ इसका उल्टा
क्योंकि जिस बरगद को जनता ने कल्पवृक्ष समझा था वह कुछ सालों बाद ही वंशवृक्ष में
तब्दील हो गया और एक ही परिवार का राज कायम हो गया। लोगों को यह बात बहुत बाद में
समझ आया कि कांग्रेस जो कि कभी विविध वृक्षों की एक बाग थी बाद में क्रमशः जो भी
उसके जड़ एवं तने का हिस्सा बनने से इंकार किया, उन
वृक्षों को इस बाग से असमय उखाड़ दिया गया या पलायन को मजबूर कर दिया गया। उसी के
नकल में अनेक प्रदेशों में भी कुछ ही वंशवृक्ष का शासन कायम होता गया। जो अब बड़ी
ही निर्लज्जता से अपने परिवार एवं कुनबे के विकास तक ही सीमित होकर रह गया
है।
इस
सच्चाई से कोई मुँह नहीं मोड़ सकता है कि वट वृक्ष के तले अनेक जीवों का पालन-पोषण
होता है। परंतु यह भी सच्चाई है कि इसके आस-पास किसी भी स्वतंत्र पेड़-पौधों का
पनपना और विकसित होना मुश्किल है। इसमें कुछ घास-झाड़ी वगैरह उगते भी हैं तो वे
जड़विहीन होते हैं। सिर्फ देखने भर की उनमें हरियाली होती है। इतने बड़े भौगोलिक, सामाजिक, धार्मिक, अनेक विविधताओं से भरे इस देश में जिसमें अगर
हम सिर्फ भौगोलिक एवं वनस्पति की विविधता पर ही नजर डालें तो भारत को अनेक वनस्पति
प्रदेशों में वर्गीकृत किया जाता है- हिमालय प्रदेशीय या पर्वतीय वृक्ष, उष्णार्द्र सदाबहार वृक्ष, आर्द्र मानसूनी वृक्ष, उष्णार्द्र पतझड़ वृक्ष, मरुस्थलीय वृक्ष तथा दलदली अथवा ज्वार भाटा
क्षेत्रों के वृक्ष। इन वृक्षों व वनों में हजारों तरह के विविध पेड़-पौधे हैं जो
वहाँ की भौगोलिक परिस्थितियों के अनुरूप यहां के बाशिन्दों एवं पर्यावरण को जीवंत
बनाते हैं।
गांधी
जी जब ‘रामराज्य’ की
बातें करते थे तो साथ में यह जोड़ना नहीं भूलते थे कि हर व्यक्ति, हर गाँव, हर
प्रदेश स्वावलंबी होगा तभी स्वराज और रामराज्य आएगा। यही कारण है कि जब
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी यह कहते हैं कि देश का सिर्फ दिल्ली या अकेला
प्रधानमंत्री नहीं, बल्कि ‘इंडिया
टीम’ यानी प्रधानमंत्री के साथ सभी राज्यों के
विभिन्न दलों के मुख्यमंत्री मिलकर काम करें, तभी
देश का एक समान विकास होगा। तो इस पर जनता का भारी समर्थन मिलता है। प्रधानमंत्री
को इससे एक कदम आगे बढ़कर सभी जिला पंचायतों और ग्राम पंचायतों को भी अपनी इस टीम
में शामिल कर सबकी भागीदारी सुनिश्चित करनी चाहिए ताकि हर गाँव, हर शहर, हर
प्रदेश के लोग अपनी परिस्थितियों एवं विविधताओं के अनुरूप एक दूसरे के सहयोग से
खुद स्वावलंबी बनंे तभी देश सही मायने में प्रगति करेगा।
भारतीय
मानस में पैठा कल्पवृक्ष या रामराज्य की अवधारणा कोई कल्पना या यूटोपिया भले लगती
हो, परंतु इसे ठीक से समझने की आवश्यकता है। अगर हम
सही अर्थों में ‘सबका साथ सबका विकास’ के नीतिवाक्य पर चलते हुए विविध पेड़-पौधों को
विकसित होने दें तो, हमें अनेकों फल मिलेंगे, हजारों फूल खिलेंगे, हजारों तरह की रंग-बिरंगी चिड़िया चहचहाएँगी।
सभी जीव-जंतु भारत के इस उपवन को गुलजार करेंगे। समय से सभी मौसम आएँगे। नदियाँ
निर्बाध बहेंगी। बर्फ में ढके पर्वत नर्म धूप से नहा कर आभा बिखेरेंगे। सभी खेत
हरे-भरे रहेंगे। किसान शाम को चौपालों पर कहकहे लगाएँगे। बच्चे खिलखिलाएँगें। सभी
को समान रूप से शिक्षा, स्वास्थ्य एवं सुरक्षा जैसी मूल
सुविधाएं मिलेगा।
उसके लिए हमें अपने कल्पना-लोक से उतरकर जमीनी
वास्तविकताओं को समझना पड़ेगा कि कल्पवृक्ष कोई एक पेड़ नहीं बल्कि विविध विशेषताओं
वाली वनस्पतियाँ एवं पेड़-पौधे मिलकर कल्पवृक्ष बनते हैं। सभी के अनेक गुणों से ही
पूरा पारिस्थितिकीय संतुलन कायम रहता है। इसी के मधुर फल से हमारी सारी मनोकामनाएँ पूरी हो सकती है। देश के सभी लोगों के इमानदारी पूर्वक समवेत प्रयास से ही ‘रामराज्य’ भी
संभव है।