सबके लिए हमेशा खुला है मध्यम मार्ग का
द्वार
सिद्धार्थ,
बुद्ध बनने के
लिए सुंदर पत्नी यशोधरा, दुधमुँहे राहुल और कपिलवस्तु राज सिंहासन का
मोह छोड़कर तपस्या के लिए चल पड़े। राजगृह पहुँचे, भिक्षा मांगते, घूमते-घूमते अलार कालाम और उद्दक
रामपुत्र के पास पहुँचे। उनसे योग साधना सीखी। समाधि लगाना सीखा। पर संतोष नहीं
हुआ। उरुवेला पहुँचे और तरह-तरह से घोर तपस्या करने लगे। पहले तो विविध प्रकार के
आहार छोड़कर सिर्फ तिल-चावल खाकर तप करते रहे, फिर निराहार तपस्या। छः साल बीत गए।
शरीर सूखकर कांटा हो गया, फिर भी ज्ञान की प्राप्ति नहीं हुई। एक दिन कुछ
ग्रामीण स्त्रियां वहां से गुजरती हुई एक गीत गाते हुए जा रही थीं। उसका अर्थ था,
‘वीणा के तारों
को ढ़ीला मत छोड़ दो। ढीला छोड़ देने से उनका सुरीला स्वर नहीं निकलेगा। पर तारों को
इतना कसो भी मत कि वे टूट जाएं।’ बात सिद्धार्थ को जंच गई। वे मान गए कि नियमित
आहार-विहार से ही योग सिद्ध होता है। अति किसी बात की अच्छी नहीं। किसी भी
उद्देश्य की प्राप्ति के लिए मध्यम मार्ग ही ठीक होता है और इसी मध्यम मार्ग पर
चलकर उन्हें ज्ञान की प्राप्ति हुई और वे भगवान बुद्ध बने।
बुद्ध
ने तत्कालीन समाज में व्याप्त अनेक प्रकार की बुराइयों, धार्मिक व जातीय कट्टरताओं एवं अनेक
प्रकार के जड़ जमाए अंधविश्वासों से मुक्ति का मार्ग बताया। समाज अधिक तर्कशील,
आधुनिक और दुःखी
और कमजोर लोगों एवं जीवों के प्रति करुणा का भाव जागृत कर एक सर्वसमावेशी समाज की
ओर अग्रसर हुआ। उनके बताये मार्ग पर भारत समेत दुनिया के अनेक साधारण एवं शासक
वर्ग ने चलकर अनेक कल्याणकारी कार्यों को अपनाया। वह चाहे अंगुलीमाल जैसा डाकू हो
या फिर कलिंग युद्ध में हजारों लोगों की हत्याओं का दोषी सम्राट अशोक। यहां तक कि
तलवार के बल पर भारत में सत्ता में आये मुस्लिम मुगल शासकों में सबसे सफल शासक
अकबर भी कमोवेश इन्हीं सर्वसमावेशी नीतियों यानी मध्यम मार्ग पर चलते हुए समाज के
हर वर्ग और समुदाय का दिल जीतते हुए एक सफल शासक बन सका।
आधुनिक
भारत में अधिकांश समाज सुधारक जिनमें स्वामी विवेकानंद, महात्मा गांधी, बाबा साहब भीमराव आंबेडकर तथा अनेक
राजनीतिक सामाजिक नेताओं ने इसी मध्यम मार्ग पर चलकर देश में जनजागरण एवं करोड़ों
लोगों के लिए मुक्ति का मार्ग दिखा सके। इन महापुरुषों ने हर तरह के अतिवाद का
विरोध किया चाहे वह धार्मिक, जातिवादी एवं अनेक प्रकार की वैचारिक कट्टरता
के विरुद्ध संघर्ष में ही अपना जीवन लगा दिया। भारत को न सिर्फ गुलामी से मुक्त
किया बल्कि भारत को एक सर्वसमावेशी, आधुनिक, तर्कशील समानतावादी समाज बनाने का सपना
देखा। जिसका प्रत्यक्ष प्रमाण हमारा संविधान है।
आजादी
के बाद 60
सालों तक कांग्रेस पार्टी शासन में रही उसका मुख्य कारण यही मध्यमार्गी नीतियां
रही थीं परंतु निरंतर उसमें विचलन आता चला गया और पार्टी सिर्फ सत्ता में बने रहने
के लिए अनेक प्रकार के अतिवादों से घिरती चली गई। जहां एक खास तरह के वंशवादी
अभिजात्य वर्ग की तानाशाही और भ्रष्टाचारियों को बढ़ावा दिया जिसके कारण सबको समान
रूप से शिक्षा, स्वास्थ्य,
रोजगार एवं
सम्मान का सपना सिर्फ संविधान एवं नीतियों के दायरों में ही सिमट कर रह गया। यहां
तक कि अपने आप को धर्मनिरपेक्ष एवं जातिनिरपेक्ष का ढिंढोरा पीटते हुए भी हर तरह
के कट्टरता को बढ़ावा देती रही। देश अनेक तरह की विकराल समस्याओं से घिरता चला गया।
इसी
का परिणाम था कि 2014 के
आम चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के प्रधानमंत्री के उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी जिसे
कांग्रेस समेत अधिकांश विरोधी दल एवं मीडिया पिछले दस-बारह वर्षों से लगातार एक
कट्टर हिंदूवादी नेता के रूप में पेश करते रहे थे। परन्तु उन्होंने लगातार अपने
विचारों और अपने सकारात्मक रचनात्मक कदमों से अपने आप को एक सच्चे मध्यम मार्गी
नेता के रूप में स्थापित किया। जिसे जनता ने भारी मतों से विजयी बनाकर देश की
सत्ता सौंपी। सरकार में आते ही वे देश की हर समस्या के समाधान के लिए अनेक लोक
कल्याणकारी, सर्मसमावेशी,
त्वरित, स्पष्ट कदम उठा रहे हैं जिसे सभी
आश्चर्य से आशा भरी नजरों से उनकी तरफ देख रहे हैं। आज पूरी दुनिया और उनके घोर
विरोधी नेता और मीडिया भी यह मानने को मजबूर हैं कि मोदी सरकार की स्पष्ट, सर्वसमावेशी नीतियों ही देश का हित है।
एक समय जो शक्तिशाली देश मोदी को अपने देश में आने देने से कतरा रहे थे वे आज उनके
स्वागत में लाल कालीन बिछा रहे हैं। आज सब हैरत में हैं कि नरेन्द्र मोदी के बारे
में उनका आकलन कितना गलत था।
दूसरी
तरफ विरोधी दल कांग्रेस के नेता राहुल गांधी जो अपने आप को गांधीवादी या मध्यम
मार्गी कहते नहीं थकते को, दूर-दूर तक दिखाई नहीं दे रहा है कि नरेन्द्र
मोदी की क्या काट निकालें। आज उनकी पार्टी लगातार हार के सदमे से बिखराव की स्थिति
में है। जिस राहुल गांधी को उन्होंने नेहरू, गांधी खानदान का होने के कारण अपना
नेता बनाया वह लगातार दस वर्षों से अपने बचकानेपन की वजह से इतनी पुरानी पार्टी की
नींव को निरंतर कमजोर कर अपनी जिम्मेदारियों से भागते फिर रहे हैं। इन दिखावटी
कारनामों से थोड़ा मीडिया आकर्षण जरूर बनता है। परंतु इससे न तो किसी समस्या का हल
निकलना है और न ही उनकी पार्टी की स्थिति में ही सुधार होने वाला है। खासकर तब जब
सामने नरेन्द्र मोदी जैसा संघर्षशील तपे-तपाये नेता से मुकाबला हो।
‘मध्यम
मार्ग’ कोई
‘कहीं
का ईंट कहीं का रोड़ा...’ वाली चीज नहीं है जो कोई जब चाहे कहीं से चुनकर
अपना मार्ग बना ले यह तो भगवान बुद्ध के बताये आठ तत्वों वाले अष्टांगिक मार्गों
से बना है जिसमें- सम्यक दृष्टि, सम्यक संकल्प, सम्यक वचन, सम्यक काम, सम्यक आजीव, सम्यक व्यायाम, सम्यक स्मृति और सम्यक समाधि। इन आठ
तत्वों को अपने में रचा-पचा लेने से ही मध्यम मार्ग निकलता है, जिसपर चलकर सबका
कल्याण होता है। यह मध्यम मार्ग इतना मुश्किल भी नहीं है परंतु यह निरंतर सतत्
प्रयास मांगता है जिसे बुद्ध या गांधी के साधारण संघर्षशील जीवन का अध्ययन कर समझा
जा सकता है। यह मध्यम मार्ग का द्वार हमेशा सबके लिए खुला होता है चाहे वह कोई
अंगुलीमाल डाकू हो, सम्राट
अशोक हो, अकबर
हो, नरेन्द्र
मोदी हों या फिर राहुल गांधी। क्या राहुल गांधी इस मध्यम मार्ग के राहगीर बनेंगे?
या अपने
बचकानेपन की वजह से ही इतिहास बनने को अभिशप्त होंगे? इतिहास जिस एक राहुल को याद करता है वह
तो सिद्धार्थ पुत्र दुधमुंहे राहुल हैं जिसे सिद्धार्थ, बुद्ध बनने के लिए नींद में छोड़ आए थे।