नीति आयोग: परिवर्तन की नई पौध!
15 अगस्त, 2014 को स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर
प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने योजना आयोग के बारे में कहा था कि ‘‘कभी-कभी पुराने घर की रिपेयरिंग में
खर्चा ज्यादा होता है, लेकिन
संतोष नहीं होता है। फिर मन करता है, अच्छा है एक नया ही घर बना लें...।’’ इसी संकल्प को पूरा करने के लिए केंद्र
सरकार ने नये साल के प्रारंभ में ही योजना आयोग के स्थान पर ‘नीति आयोग’ का गठन किया है। सरकार ने कैबिनेट के
जिस प्रस्ताव के जरिए नीति आयोग बनाया है उसके प्रारंभ में ही महात्मा गांधी के
उक्ति को उद्धृत किया गया है, इसके मुताबिक महात्मा गांधी ने कहा था कि ‘सतत विकास जीवन का नियम है और जो
व्यक्ति हमेशा हठधर्मिता बनाए रखने की कोशिश करता है, वह स्वयं को भटकाव की ओर ले जाता है।’
प्रस्ताव में महात्मा गांधी, स्वामी विवेकानंद से लेकर बी.आर.
अंबेडकर, पंडित
दीनदयाल उपाध्याय, तमिल
कवि तिरवल्लुवर और असमिया भाषी महान संत शंकरदेव के दार्शनिक चिंतन का उल्लेख किया
गया है। इससे यही समझ बनती है कि नीति आयोग की भूमिका आने वाले समय में देश की
राजव्यवस्था में एक नया अध्याय लिखेगी। यह जवाहर लाल नेहरू के योजना आयोग की
पूँजीवाद, साम्यवाद
या उदारवाद के वैश्विक प्रतीक की जगह ठेठ देशी राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक चिंतन एवं
विचारों पर आधारित होगी।
यह सही है कि पिछले 65 वर्षों में देश और विश्व
की आर्थिक परिस्थितियाँ काफी बदली हैं। योजना आयोग का गठन सोवियत रूस के साम्यवादी
ढाँचे पर किया गया था, परंतु
90 के दशक में सोवियत रूस के बिखरने एवं साम्यवाद के सपनों पर तुषारापात होने के
बाद वैश्वीकरण, उदारवाद
और बाजारवाद ने पूरी दुनिया को जिस तरह अपने गिरफ्त में लिया, उसकी चपेट में भारत की नेहरूवादी
मिश्रित अर्थव्यवस्था ने भी घुटने टेक दिए। योजना आयोग में भी इसकी साफ झलक मिलने
लगी। योजनाएँ बनाने के नाम पर योजना आयोग ने अब तक संवैधानिक संस्था वित्त आयोग से
लेकर कई केन्द्रीय मंत्रालयों के अधिकारों का अपहरण कर लिया। राज्य सरकारों के
वित्तीय आवंटन के अधिकार तक अपने हाथ में ले लिए थे, यहाँ तक कि देश की गरीबी रेखा अपने
मनमाने आँकडों के अनुरूप गढ़ने लगी, जिसका आम आदमी के वास्तविक जीवन-निवर्हण से
दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं रह गया था। यहाँ तक कि किस राज्य में कितना गरीब है,
उसका भी फैसला
वहाँ के वास्तविक स्थितियों, जिसका फैसला गँंव के पंचायत जिला या राज्य
सरकार को किनारे रख कर योजना आयोग ही करने लगा था।
राज्य सरकारें लगातार यह माँग करती रही थी कि
योजना आयोग, जो
गरीबों की संख्या बता रहा है उससे कई गुणा अधिक गरीब उसके राज्य में हैं और उसके
भौगोलिक एवं जमीनी हिसाब से वित्तीय एवं संसाधनों का आवंटन कर,े पर योजना आयोग मनमाने फैसले लेती रही
और संघीय व्यवस्था को ठेंगा दिखाती रही। मुख्यमंत्री इसके दरवाजे पर दंडवत् होने
को मजबूर होते रहे। गांधी के ग्राम स्वराज इसके द्वारा बनाये मनमानी कल्याणकारी
योजनाएँ कागजी कार्रवाइयों और भ्रष्टाचार में दबकर दिल्ली की मेहरबानियों पर पलने
की अभ्यस्त होती गई।
नीति आयोग जिसका पूरा नाम नैशनल इंस्टीट्यूट
फॉर ट्रांसफार्मिंग इंडिया और हिंदी में राष्ट्रीय भारत परिवर्तन संस्थान आयोग कहा
जा रहा है। कैबिनेट प्रस्ताव, जिसके तहत इसका गठन हुआ के मुताबिक ‘यह आयोग विकास प्रक्रिया में निर्देश
और रणनीतिक परामर्श देगा। नए आयोग के उद्देश्यों को स्पष्ट करते हुए केंद्र सरकार
ने जो बयान जारी किया है, उसके अनुसार नीति आयोग राज्यों के साथ सतत आधार
पर संरचनात्मक सहयोग की पहल और तंत्र के माध्यम से सहयोगपूर्ण संघवाद को बढ़ावा
देगा। नीति आयोग ग्राम स्तर पर विश्वसनीय योजना तैयार करने के लिए तंत्र विकसित
करेगा और इसे उत्तरोत्तर उच्च स्तर तक पहुँचाएगा। आयोग राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय
विशेषज्ञों, प्रैक्टिशनरों
तथा अन्य हितधारकों के सहयोगात्मक समुदाय के जरिए, ज्ञान, नवाचार और उद्यमशीलता के लिए सहायक
प्रणाली बनाएगा। इसके अतिरिक्त आयोग कार्यक्रमों और नीतियों के क्रियान्वयन के लिए
प्रौद्योगिकि उन्नयन और क्षमता निर्माण पर जोर देगा।
नीति आयोग का जो स्वरूप तय किया गया है,
उसमें भारत के
प्रधानमंत्री इसके अध्यक्ष होंगे। गवर्निंग काउंसिल में राज्यों के मुख्यमंत्री और
केन्द्र शासित प्रदेशों के उपराज्यपाल या प्रशासक शामिल होंगे। विशिष्ट मुद्दों और
ऐसे आकस्मिक मामले, जिनका
संबंध एक से अधिक राज्य या क्षेत्र से हा,े को देखने के लिए क्षेत्रीय परिषद् गठित की
जाएगी। ये परिषदें विशिष्ट कार्यकाल के लिए बनाई जाएँगी। योजना आयोग की तरह ही
इसका एक उपाध्यक्ष होगा, जिसकी नियुक्ति प्रधानमंत्री करेंगे। इसके
अलावा एक मुख्य कार्यकारी अधिकारी भी होगा। इसके सदस्य पूर्णकालिक होंगे और
अंशकालिक भी। वहीं पदेन सदस्यों में केंद्रीय मंत्रिपरिषद से अधिकतम चार सदस्य
प्रधानमंत्री द्वारा नामित होंगे।
सरकार ने ‘नीति आयोग’ नामक जिस पौध को महान विभूतियों के
महान विचारों की उर्वर जमीन पर एक पुराने दरख्त की जगह लगाया है, उससे यह आशा अवश्य जगती है कि यह सरकार
जब भी कोई योजना बनायेगी तो वह गांधी के स्वावलंबी ग्राम स्वराज तथा हासिए पर पड़ा,
अंतिम व्यक्ति
का कल्याण तथा दीनदयाल उपाध्याय के अंत्योदय का ध्यान उसकी प्राथमिकता में होगा।
स्वामी विवेकानंद तथा शंकरदेव के दर्शन को ध्यान रखते हुए दुःखी-दरिद्र, बीमार, कुपोषित, अशिक्षित भारतीयों को मुख्यधारा में
लाने के लिए प्राण लगा देगी। अंबेडकर के सामाजिक एवं आर्थिक लोकतंत्र के सपनों को
साकार करने के लिए किसी भी दबाव के आगे नहीं झुकेगी।
आशा है, इस वासंती मौसम में योजना आयोग की जगह
लेने वाला यह पौधा परिवर्तन का वाहक बनेगा और नई कोंपल के साथ ऐसे फूल, मंजरी एवं फल लेकर आयेगी, जिससे ग्रामीण स्तर पर पंचायतीराज से
लेकर राज्य सरकारें एवं केन्द्र सरकार समन्वय भाव के साथ सहभागिता से विकास कार्यो
को अंजाम दंेगी। भारत का हरेक ग्राम स्वावलंबी बनेगा...लोग महानगरों में सिर्फ पेट
पालने के लिए पलायन नहीं करेंगें...देश के हरेक बच्चों को घर के पास समान स्कूली
व्यवस्था के तहत गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिलेगी...हरेक नागरिक को बिना भेदभाव के
स्वास्थ्य सेवाएँ नसीब होंगी...किसी के साथ लिंग, जाति, धर्म या क्षेत्र के आधार पर अन्याय
नहीं होगा...किसान कर्ज तले दबकर आत्महत्या नहीं करेंगे...देश के सारे आर्थिक
संसाधन कुछ खास लोगों के पास न होकर सभी नागरिकों को मौलिक सुविधाएँ अवश्य मिलेगी।
इन्हीं आशाओं के साथ इस पौधे का हम स्वागत करते हैं कि विकसित होकर यह खूब फूले,
खुब फले और जिन
महान विचारों की उर्वर भूमि पर इसे रोपा गया है, उसे कभी न भूले!