Saturday, November 15, 2014

डॉक्टरों पर नकेल!

यह तो बताना मुश्किल है कि भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के दीक्षांत समारोह में प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी डॉक्टरों को सलाह दे रहे थे या मार्मिक अपील कर रहे थे कि वे छुट्टियों में समय निकालकर पिछड़े इलाकों व गाँवों में जाकर गरीबों का इलाज करें। उन्होंने कहा कि मैं 365 दिन की बात नहीं कर रहा। छुट्टियाँ सभी को मिलती हैं, उन दिनों में थोड़ा समय निकालें और पिछड़े इलाकों में जाकर इलाज करें। इसके पहले भी अनेक समारोहों में पूर्व राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री से लेकर स्वास्थ्य मंत्रियों तक डॉक्टरों से अपील से लेकर चिरौरी तक करते रहे हैं कि समाज की गरीब जनता के हितों को ध्यान में रखते हुए केवल अधिक धन के लिए संस्थान को छोड़ कर विदेश एवं निजी अस्पतालों में न जाएँ और गाँवों में भी अपनी सेवा दें। परंतु इसका कोई सकारात्मक नतीजा नहीं निकला, जिसका जिक्र खुद केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ हर्षवर्धन ने अपने भाषण में किया और कहा कि पहले यहाँ से पढ़ाई करने वाले अधिकांश डॉक्टर विदेश चले जाते थे। अब भी 40 प्रतिशत विदेश पलायन कर जाते हैं। हाल ही में भुवनेश्वर एम्स के उद्घाटन में स्वास्थ्य मंत्री ने बताया था कि एक एमबीबीएस तैयार करने में संस्थान को लगभग आठ से दस करोड़ रुपये खर्च करने पड़ते हैं।
कुछ वर्ष पहले दिल्ली स्थित मीडिया स्टडी ग्रुप के एक अध्ययन में यह तथ्य उजागर हुआ था कि सिर्फ एम्स से पढ़ाई करके निकलने वाले डॉक्टरों में 53 फीसद विदेश चले जाते हैं। अब भी 40 प्रतिशत से मतलब डॉ. हर्षवर्धन का यह नहीं है कि पलायन में कमी आई है, बल्कि पलायन तो पहले से भी ज्यादा बढ़ा ही है। अब हो यह रहा है कि देश के महानगरों में ही यूरोपीय एवं अमेरिकी सुख-सुविधा देने वाले अनेक निजी अस्पतालों में वे सेवा देने लगे हैं, जिसमें कहने को तो वे भारत में हैं, परंतु वे इलाज यूरोपीय और अमेरिकी एवं अन्य अमीर विदेशी नागरिकों का ही या उनके समान ही खर्च करनेवाले एवं उनके ही अंदाज में जीने वाले भारतीयों का कर रहे हैं। जिसमें उन्हें विदेशों के समान ही मोटी रकम और सुख-सुविधा मिल रही है। इसमें गाँव और गरीब का नाम कहीं नहीं आता। 
पिछले दिनों दुर्गापूजा में झारखंड के देवघर जिले में बसे अपने गाँव गया था। पहुँचकर थोड़ा आराम कर ही रहा था कि पड़ोस के घर जोरों का शोर सुनाई पड़ा। जाकर देखा तो पूरे गाँव के लोग वहीं जमा थे। घर के अंदर किसी गुणी-मंतरी ने किसी की आत्मा को वहाँ से निकालने के लिए मजमा लगा रखा था। मैंने मिथलेश से, जो रिश्ते में भतीजा लगता है, पूछा कि क्या बात है, तो उसने फूट-फूटकर रोते हुए अपनी आपबीती सुनायी। संक्षेप में यह कि शादी के काफी दिनों बाद बाप बना था। बच्चा पैदा होने का दिन आ गया था, उसकी पत्नी दर्द से बेचैन थी, लेकर देबीपुर अस्पताल गया परंतु वहाँ डॉक्टर या नर्स कोई नहीं मिला, फिर देवघर गया। सदर अस्पताल में भर्ती किया, परंतु वहां भी डॉक्टर रात को नदारद थी। बच्चा होने को था परंतु नर्स ठीक से ध्यान नहीं दे रही थी, बोलने पर उलटा गाली देती थी। पत्नी की हालत बिगड़ रही थी, बच्चा आधा बाहर आ चुका था, परंतु पूरी तरह से बाहर आ नहीं पा रहा था। नर्स ने उसे जल्दी प्राइवेट नर्सिंग होम लेकर जाने की सलाह दी। वह किसी तरह संभालते हुए पास के नर्सिंग होम में गया, वहाँ डॉक्टर ने ऑपरेशन करके बच्चा निकाला, फिर बच्चे के कमजोर होने की हवाला देकर बेबी इनक्यूबेटर में चार दिन तक रखा। फिर बताया कि बच्चा मर गया। उधर पत्नी भी लगातार बेहोशी में थी। अस्पताल ने साठ हजार रुपए का बिल भरने को कहा, वह डॉक्टर के सामने खूब रोया, परंतु उसने टका सा जवाब दिया, मरीज को ले जाना है तो पहले पैसा भरो, नहीं तो फीस बढ़ती रहेगी। उस समय कई नाते-रिश्तेदारों से संपर्क किया, परंतु कुछ हासिल नहीं हुआ; अंत में देवघर के एक दबंग नगर पार्षद जिनके लिए चुनाव में प्रचार का काम किया था, उनके पास जाकर रोया-गिड़गिड़ाया तब उसने डॉक्टर को कुछ पैसा एवं धमकी देकर वहां से उसके मरे बच्चे एवं पत्नी को मुक्त कराया। दो महीने बाद भी पत्नी अभी तक खाट पर पड़ी है और कमजोरी तथा सही इलाज के बिना विक्षिप्तावस्था में पहुँच गई है। अब ओझा-गुणी उसके मरे बच्चे की आत्मा की शांति के नाम पर लूट रहे हैं।
हमेशा मस्ती में रहने वाला हुल्लड़बाज मिथलेश दो साल पहले ही पिता की मृत्यु के बाद विधवा माँ समेत घर का बोझ किसी तरह ढो रहा है। कैसे उस दिन वह अपने मरे बच्चे और मरणासन्न पत्नी को लेकर लौटा होगा? इसकी पत्नी अपने बच्चे को खोकर इलाज के अभाव में दिमागी तौर पर भी असंतुलित होती जा रही है और अब आत्मा व उसकी शांति के नाम पर अंधविश्वासों की एक अंतहीन सुरंग में धंसता जा रहा है। अगर सही समय पर इसकी पत्नी को सही इलाज मिल जाता तो क्या हँसता-खेलता, बच्चे की किलकारियों से गूँजता एक खुशहाल परिवार नहीं होता? मिथलेश तो एक उदाहरण मात्र है। ऐसी घटनाएँ रोज हजारों की संख्या में हो रही हैं, यहाँ तक कि दिल्ली में भी बड़े-बड़े अस्पतालों में डॉक्टरों और अस्पताल प्रशासन की बेपरवाही और बेरुखी के कारण गर्भवती महिलाएं एवं मरीज अस्पताल के बाहर दम तोड़ते देखे जाते हैं। क्या अब समय नहीं आ गया है कि सरकार जिन डॉक्टरों को बनाने में देश के आम गरीब नागरिकों का करोड़ों रुपया लगाती है, उनको संस्थानों में नामांकन से पहले एक समझौता-पत्र पर हस्ताक्षर कराए कि आप डिग्री लेने के बाद देश के किसी भी कोने में आवश्यकतानुसार सेवा देंगे, नहीं तो अपनी शिक्षा का पूरा खर्च खुद उठायेंगे?

इसके पहले यूपीए सरकार के स्वास्थ्य मंत्री गुलाम नबी आजाद गाँवों के डॉक्टरों के लिए अलग कोर्स एवं योजना जोर-शोर से लेकर आये थे, परंतु वह भ्रष्टाचार और लालफीताशाही के चंगुल में कहाँ बिला गये, पता नहीं। अधिकांश राज्य सरकारें अभी तक डॉक्टरों को इस बात पर राजी करने में हलकान होती रही हैं कि डॉक्टर सरकारी सेवा करते हुए निजी प्रैक्टिस न करें और गाँवों में भी अपनी सेवाएँ दें। काश! प्रधानमंत्री की सलाह या मार्मिक अपील का कुछ असर इन डॉक्टरों पर हो और वे गाँवों की ओर रुख करें, ताकि गाँव के बीमारों को शहरों की ओर पलायन न करना पड़े और वहाँ से भी लुट-हारकर अंत में अंधविश्वासों का शिकार बन ओझा-गुनियों के जाल में फँसकर असमय मौत के मुँह में न समाना पड़े।