संपूर्ण स्वच्छता
अभियान!
2 अक्तूबर गाँधी जयंती पर खुद झाड़ू लगाने निकलेंगे
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी। प्रधानमंत्री ने स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर लालकिले
से ‘स्वच्छ भारत अभियान’ की घोषणा
की थी। केंद्र सरकार की योजना इस अभियान को जन-आंदोलन का रूप देकर आर्थिक
गतिविधियों से जोड़ना है। सरकार का लक्ष्य गांधी की 150वीं जयंती 2019 तक पूरे
देश को स्वच्छ भारत में तब्दील करना है।
यह बात जगजाहिर है कि गंदगी और प्रदूषण के कारण ही लोग
अधिकांश बीमारियों का शिकार हो रहे हैं और भारी मात्रा में जन-धन का नुकसान हो रहा
है। गाँव-शहर, नदियां, पहाड़ हर
जगह गंदगी का अंबार है। कोई भी सार्वजनिक स्थल, चाहे वह
सरकारी कार्यालय, शिक्षा संस्थान, बस अड्डा, रेलवे
स्टेशन या रेल के डब्बे हों, यहाँ तक कि
बीमारियों से निजात दिलाने वाले सरकारी अस्पताल ही क्यों न हों, गंदगी से
अँटे मिलेंगे, कोई भी सड़क नहीं, जिसके
किनारे गंदगी के ढेर न मिल जाएँ। अगर कूड़े का ढेर न मिले तो उसपर चलने वाले वाहन
अपने प्रदूषित धुएँ से उसकी आपूर्ति कर देंगे। किसी भी शहर के अच्छे से अच्छे
संभ्रान्त कॉलोनियों में आगे से भले साफ-सुथरा दिखाई पड़े, परंतु उसके
पिछवाड़े गंदगी के सैलाब में समाये झुग्गी-झोंपड़ियों का विस्तार होगा, जिसमें
सिर्फ गंदगी और प्रदूषण का ही साम्राज्य होता है। अकसर इसी के बीच से शहर का गंदा
नाला निकलता है, जिसमें आदमी और कुत्ते, सुअर सभी
एक साथ रेंगते हैं। यहाँ आदमी और गंदे जानवरों का भेद मिट जाता है सिर्फ गरीब और
अमीर का फर्क साफ दिखाई देता है। शहर ही नहीं बल्कि हमारे गाँव, देश की
अधिकांश नदियाँ, जंगल, जमीन, पहाड़ यहाँ
तक कि जमीन के नीचे पाताल तक गंदगी और प्रदूषण की मार से ग्रस्त हैं।
यह गंदगी तो प्रत्यक्ष तौर पर दिखाई पड़ जाती है, इसके अलावे
हमारे देश में अनेकों तरह की अप्रत्यक्ष मानसिक गंदगी के भी अंबार हैं, जो एक तरह
से प्रत्यक्ष गंदगी के जनक हैं। इसके अनेंको रूप हैं, जिनमें
मुख्य हैं- भ्रष्टाचार, आतंकवाद, जातिवाद, सांप्रदायिकता
और अंधविष्वास आदि। इसके और इसकी अनेकों विषबेल के कारण ही देश अनेक तरह की
जानलेवा बीमारियों से ग्रसित है। आजादी के बाद अबतक की सारी सरकारें इन गंदगियों
से लड़ने के वादे के साथ सत्ता में आती रही हैं, परंतु
सत्ता पाते ही कुछ दिनों में पता चलता है कि वह खुद ही इस गंदगी का आकंठ शिकार
होकर बीमार हो गई और इन बीमारियों को पालते-पोसते कई गुणा ज्यादा गंदगी खुद फैलाने
लगी है।
महात्मा गाँधी आजीवन दोनों तरह की गंदगियों से लड़ते रहे। उनके
रोज के क्रियाकलाप का अध्ययन करने पर आसानी से समझा जा सकता है कि वे किस तरह अपने
आवास, अपना शौचालय तथा आसपास की सफाई खुद करते थे। जिसे अधिकांश लोग
छोटा काम मानकर दूसरे पर आश्रित रहते हैं। कई बार तो बहुत बड़े-बड़े नेता और खुद
उनके परिवार के लोग ही उनको इन साधारण कामों में लगे देखकर खिन्न हो जाया करते थे, परंतु उनके
लिए स्वच्छता का महत्त्व सर्वोपरि था। गाँधीजी एक ऐसे सफाईकर्मी थे, जिन्होंने
स्वच्छता का अनवरत अभियान अपने शरीर, घर और मन से
प्रारंभ कर राजनीतिक गंदगी यानी अंग्रेजों की गुलामी से मुक्ति के लिए स्वतंत्रता
अभियान से लेकर देश में फैले छुआछूत, अंधविश्वास, सांप्रदायिकता
जैसे अनेकों गंदगियों के खिलाफ अनेकों आंदोलन और अभियान चलाते हुए शहीद हो गए, ताकि पूरी
मानव जाति स्वच्छता, स्वतंत्रता, समानता, भाईचारे
तथा पूरी प्रकृति के सहअस्तित्व के साथ सदियों-सदियों तक सम्मान के साथ अपना
अस्तित्व बचाये रह सके।
देश की आजादी व गाँधीजी की मृत्यु के बाद विकास के लिए एक
अराजक दौड़ में हम गाँधीजी के स्वच्छता अभियान से लगातार दूर होते गए। इसी का
परिणाम है कि आज देश एकतरफ गंदगी और प्रदूषण के मार से कराह रहा है तो दूसरी तरफ
भ्रष्टाचार, जातिवाद, सांप्रदायिकता, अंधविश्वास, आतंकवाद
जैसी अनेकों गंदगियों से अनेकों भयावह समस्याओं से जूझ रहा है। ऐसे में
प्रधानमंत्री का गाँधीजी के सपनों को आगे रखकर प्रारंभ किया जा रहा यह सफाई अभियान
क्या सफल हो पाएगा? यह अभियान क्या सिर्फ दिखनेवाले कूड़े
और गंदगी की सफाई तक ही सीमित रहेगा या उससे आगे जाकर सार्वजनिक जीवन में आए अनेक
प्रकार की जानलेवा अप्रत्यक्ष गंदगियों से मुक्ति दिलाकर वास्तविक प्रगति का भी
मार्ग प्रशस्त करेगा?
इसमें कोई संदेह नहीं है कि स्वच्छ भारत अभियान के लिए
प्रधानमंत्री खुद आगे आकर जिस तरह का संदेश दे रहे हैं, उसमें भी
प्रत्यक्ष दिखने वाली गंदगी और अप्रत्यक्ष रूप से आम लोग और पूरे देश को संपूर्ण
स्वच्छ और स्वस्थ करने के बुनियादी बीज इसमें दिखाई पड़ रहे हैं। इस स्वच्छता
अभियान में जिस तरह सभी सरकारी और सार्वजनिक क्षेत्रों, ग्रामीण व
शहरी स्थानिय निकायों, स्वयं सहायता
समूहों, युवा संगठनों, बाजार संगठनों व
व्यापारिक-औद्योगिक संगठनों एवं मीडिया को शरीक होने का आह्वान किया है, उससे यह
आशा जगती है कि इस सफाई अभियान के दौरान देश में हर स्तर पर ऐसी रचनात्मक उर्जा
पैदा करेगी, जिससे सभी तरह की गंदगियों का सफाया
होगा।
घर, सड़क, सार्वजनिक
स्थल, नदियाँ, पहाड़, पाताल सभी
प्रदूाण मुक्त होंगे, देश से भ्रष्टाचार
का नामोनिशान मिट जाएगा, कहीं भी जाति, धर्म, वर्ग और
लिंग के आधार पर भेदभाव नहीं होगा। मेट्रो की तरह सारी रेलगाड़ियों में एक ही क्लास
होगी। सभी वर्गों के बच्चे अपने घर के पास समान रूप से समान स्कूल में अपनी
मातृभाषा में शिक्षा पायेंगे। बड़ी-बड़ी बहुमंजिली इमारतांे के पीछे
झुग्गी-झोंपड़ियों का विस्तार नहीं होगा। किसी भी कॉलोनी या अपार्टमेंट के एक फ्लैट
में मृत्यु का मातम हो, उसी समय पड़ोस के
मकान या फ्लैट में जश्न से पूरा माहौल गुंजायमान नहीं होगा। बीच भरी सड़क में किसी
राहगीर की कोई हत्या या किसी महिला के आबरू से खिलवाड़ कर कोई खुलेआम फरार नहीं हो
पाएगा और विकास का समान हिस्सा गाँधी के उस अंतिम व्यक्ति तक भी निर्बाध पहँुचेगा।
इस तरह अनेक गंदगियों
से मुक्ति के लिए सिर्फ सरकार ही नहीं, पूरे समाज को इस
सफाई अभियान में शामिल होना पड़ेगा। यहाँ प्रधानमंत्री की नेतृत्व क्षमता भी कसौटी
पर होगी। क्या इनकी झाड़ू में भी वही नैतिक बल और आत्मशक्ति आ पायेगी, जो गांधी
के एक मुट्ठी नमक उठा लेने में या दलितों को मंदिर प्रवेश जैसे मामूली दिखने वाली
अभियानों के कारण भारत और पूरे दलित समुदाय की मुक्ति का मार्ग खोल दिया था। हमें
सकारात्मक सोच रखनी चाहिए और ‘स्वच्छ भारत’ नामक इस
अँखुआते बीज को खाद, पानी देकर अनेक झंझावतों से बचाने
में पूरा सक्रिय सहयोग देना चाहिए, ताकि 2019, गाँधीजी के
150वीं सालगिरह तक भारत गाँधी के यानी भारत के आम लोगों के
सपनों का भारत बन जाए!