Tuesday, April 1, 2014



क्या तुम्हारे घर में भी कोई मरा!

गौतम बुद्ध ईसा से लगभग 500 साल पहले हुए थे। जातक कथा की एक कहानी में अपने मृत शिशु के शोक में बेचैन गौतमी को भगवान बुद्ध कहते हैं, ‘‘जिस घर में कोई नहीं मरा हो, उस घर से सरसों के दाने माँग ला। फिर मैं तुझे दवा दूँगा, जिससे तेरा पुत्र पुनः जीवित हो जाएगा।’’ सदियों बाद 2014 में बुद्ध के ही कर्मभूमि में इसी से मिलता-जुलता एक वाक्य इन दिनों समाचारों में छाया हुआ है, ‘‘क्या तुम्हारे घर में भी कोई मरा!’’ यह कथन भगवान बुद्ध का नहीं बल्कि आज के लोकतांत्रिक लोककल्याणकारी गणराज्य भारत की सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश  के मुख्यमंत्री के पिता एवं समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव का है, जोकि खुद  सवा अरब के इस देश के प्रधानमंत्री पद का भी दावेदारी कर रहे हैं। मुलायम सिंह जी ने यह वाक्य तब कहा, जब एक पत्रकार ने डॉक्टरों की हड़ताल के चलते गंभीर हालत वाले मरीजों के मौत की बाबत उनसे सवाल पूछा था।
कानपुर के गणेश शंकर विद्यार्थी मेडिकल कॉलेज के छात्रों के साथ सपा विधायक इरफान सोलंकी व उनके गनर के द्वारा गत 28 फरवरी को मार-पीट के बाद उत्तर प्रदेश के सभी मेडिकल कॉलेजों में हड़ताल हो गई। बाद में यह हड़ताल प्रदेश के बाहर भी फैलने लगी। सात दिनों की हड़ताल में इलाज के अभाव में 40 मरीजों के मरने का अंदेशा है। उल्लेखनीय है कि पूरे प्रदेष में मरीजों के हालात बिगड़ते जाने के बाद हाई कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेते हुए उत्तर प्रदेश सरकार पर डॉक्टरों के खिलाफ की गई कार्रवाई और उन पर एस्मा लगाने पर कड़ी टिप्पणी करते हुए नाराजगी जताई। हाई कोर्ट ने डॉक्टरों के साथ सहानुभूति जताते हुए उनसे हड़ताल खत्म करने को कहा तब जाकर कहीं हालात काबू में आए।
बुद्ध ने जब उद्यान-भ्रमण के समय वृद्ध, बीमार और मृत व्यक्तियों को देखा, खुद उनके भीतर कई सवाल पैदा हुए थे। उनके भीतर सवाल पैदा न हों, इसके लिए राजसत्ता की ओर से कैसे प्रयत्न किये गए थे, इसका वर्णन अश्‍वघोष ने बुद्धचरितमें किया है, ‘हिमालय की तलहटी में जैसे हाथी अपने हथनियों के समूह के साथ घूमता है, वे सुन्दर स्त्रियाँ सिद्धार्थ को वैसे ही अपने आस-पास घुमा रही थीं। उनमें से कुछ सुन्दरियों ने शराब के नशे में कामातुर होकर अपने उन्नत वक्ष का स्पर्श कराने के लिए सिद्धार्थ की छाती को अपनी ओर खींच लिया। कुछ ने नशे में अभिनय करते हुए लता की तरह मृदु हाथों से उसे आलिंगन दिया। एक कहने लगी, हे आर्य, इसी समय मेरा भोग कीजिए।’’ जाहिर है, ये सब सुन्दर स्त्रियाँ स्वतः नहीं कर रही थीं बल्कि उन्हें इसी के लिए सत्ताधारी राजा द्वारा नियुक्त किया गया था कि सिद्धार्थ कभी आम लोगों के जीवन से जुड़ी मूल समस्याओं को जान ही न सके। अगर वे जान जायेंगे तो उनकी निर्द्वद्व सत्ता कई पीढ़ियों तक कायम नहीं रह सकेगी। इसलिए उनके आस-पास उन्हें सारे भौतिक सुखों का अंबार लगा दिया ताकि वे प्रश्‍नविहीन बनकर उसी में आजीवन रमे रहें। परंतु फिर भी सारी सुख-सुविधाएँ भी उन्हें ऐसे प्रश्‍नों  से रोक नही पाई।
वृद्ध, बीमार एवं मृत्यु को देखकर, यौवन के कामुक प्रदर्शन और चारों तरफ के हिंसा को देखकर सिद्धार्थ को लगा, जीवन का कोई बड़ा उद्देश्‍य  होना चाहिए। इसलिए लगभग ढाई हजार साल पहले सिद्धार्थ बुद्ध बनने के लिए राज-पाट, माया-मोह सब त्यागकर निकल पड़े, आमलोगों को प्रश्‍न करने के लिए तमीज पैदा करने, संसार को तार्किक बनाने। लोकतंत्र को कायम करने बुद्ध बनकर उन्होंने आजीवन जो भी ज्ञान दिया, उसका सार यही है कि लोगों को प्रश्‍न करने की आजादी हो, उसमें तर्क करने की क्षमता पैदा हो, जिज्ञासाओं में ही सारी समस्याओं का समाधान है।
जातक कथा में वर्णित गौतमी की यह कथा तार्किकता को बल देता अनेकों उदाहरणों में एक है। जिसमें अपने मृत बच्चे को गोद में चिपकाये हुए वह उसे सिर्फ बीमार समझकर इलाज के लिए दर-दर भटक रही थी, उससे बुद्ध कहते हैं कि जिस घर में कोई नहीं मरा हो, उस घर से सरसों के दाने माँग ला। इस प्रश्‍न से गौतमी को समाधान मिल जाता है और वह मृतक बच्चे से मुक्त होकर जीवन की एक नई तार्किक दिशा पाती है।
मुलायम सिंह यादव का यह प्रतिप्रश्‍न भी इस आम चुनाव यानी भारतीय लोकतत्र का हर पाँच साल पर होनेवाले समुद्र मंथन का उन हजारों ज्वलंत मुद्दों और प्रश्‍नों में से एक मामूली प्रश्‍न ही हो सकता है, परंतु इसी में हमारी सभ्यता के विकास की कहानी और लोकतंत्र का मूल काला चरित्र सामने आ जाता है कि हमारे सत्तासीन लोग आज भी आमलोगों की समस्याओं के प्रति कितना अहंकार भरा नजरिया रखते हैं? जनता को आज भी जानवरों की तरह रखने पर विश्‍वास करते हैं? एक तरफ तो बाजार है, जो अपने मायाजाल में मॉल-मल्टीप्लेक्स में डियो, पोशाक और एक से बढ़कर सुन्दरियों और उनके सौन्दर्य प्रसाधन के विज्ञापन ऐसे दृश्‍य रचते हैं कि लोग इसी में गुम होकर प्रश्‍नविहीन होता जाए, वहीं दूसरी तरफ अनेक धार्मिक पाखंडी लोग ऋषि‍-मुनियों के भेष  में दिन-रात लोगों को तार्किकता और मूल प्रश्‍नों से भटकाकर अंधविश्‍वासी और अंधधार्मिक बनाने में तल्लीन हैं। इन सब में मूल बात यह है कि इन्हें सत्ताधारियों का पूरा समर्थन प्राप्त है ताकि लोगों के जीवन से जुड़े प्रष्नों से बरगलाया जा सके और वे लोकतंत्र के नाम पर सिर्फ अपने परिवार और कुनबों के बीच सत्ता को बनाये रखकर सत्ता का सुख भोग सकें।
आज देश में 16वीं लोकसभा का चुनाव दस्तक दे रहा है। हमें सत्ताधारियों के ऐसे प्रतिप्रश्‍नों से डरना नहीं है बल्कि और जोर-शोर से उनसे पूछना है कि हमें जवाब दें कि आज भी देश के सभी बच्चों को समान गुणात्मक शिक्षा क्यों नहीं मिल पा रही है? सभी लोगों के लिए समुचित स्वास्थ्य की व्यवस्था क्यों नहीं है? सभी को ‘’शुद्ध पानी और भोजन क्यों उपलब्ध नहीं है? सबको समान रूप से सुरक्षा और न्याय कब मिलेगा? सत्ता में समान रूप से सहभागी, देश के सभी वर्गों के लोग, खासकर महिलाएँ कब बनेंगी? मुलायम सिंह जी यह आपका कैसा समाजवाद है जो चाहे भ्रष्‍टाचार विरोधी लोकपाल कानून हो या महिला आरक्षण विधेयक, हमेशा इसके मार्ग में रोड़ा लगाता है? इस तरह के अनेकों प्रश्‍न हैं, जिनका देश के लोगों को जवाब चाहिए ताकि जनता सबको कसौटी पर कसकर अपना मतदान करे।
बुद्ध के जमाने से आज तक हमारी सभ्यता ने हजारों साल का फासला तय किया है। अनेकों समाजसुधारकों और स्वतंत्रता सेनानियों के निरंतर संघर्ष और बलिदान से हमें प्रश्‍न करने की आजादी मिली है। हम इतनी आसानी से नहीं झुकेंगे, इसका जवाब लोकतंत्र के इसी महायज्ञ में देंगे।